भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
श्वेतैश्छत्रैः पताकाभिर्ध्वजवारणवाजिभिः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
श्वेतो ग्रहस्तथा चित्रां समतिक्रम्य तिष्ठति ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
श्वेतो नीलश्च भासश्च काष्ठवांश्चैव पर्वतः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
श्वेतोच्चय़निभाकारो नानाविधविभूषणः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
श्वेतोष्णीषं श्वेतहय़ं श्वेतवर्माणमच्युतम् |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
श्वेतोष्णीषः पाण्डुरेण ध्वजेन; श्वेतैरश्वैः श्वेतशैलप्रकाशः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
श्वेतोष्णीषाश्च दृश्यन्ते त्रय़ एव जनार्दन |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
श्वेतोष्णीषाश्च दृश्यन्ते सर्वे ते शुक्लवाससः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
श्वो नरेन्द्रसहस्राणि राजपुत्रशतानि च |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
श्वो निरीक्षन्तु मे वीर्यं त्रय़ो लोका महाहवे |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
श्वो वाद्य वा महावाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्वोभाविनि महाय़ुद्धे दूत्येन क्रूरवादिना |
१५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
श्वोभूते कत्थनावाक्यं विज्ञास्यति सुय़ोधनः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
श्वोभूते किमकार्षुस्ते दुःखशोकसमन्विताः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
श्वोभूते धृतराष्ट्रस्य समीपं प्राप्य पाण्डव |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
श्वोभूते निर्ययौ राजा सस्त्रीवालपुरस्कृतः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
श्वोभूते भर्तृमरणे सावित्र्या भरतर्षभ |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
श्वोभूते मनुजव्याघ्राश्छन्नवासार्थमुद्यताः ||
२८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
श्वोभूतेऽथ ततः शौरिर्वसुदेवः प्रतापवान् |
१५ क
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
श्वोभूतेऽथ ततः साम्वो मुसलं तदसूत वै |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
श्वोऽभूते धर्मनित्येन मृतः सञ्जीवितः पुनः ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
श्वोऽस्मि हन्ता दुरात्मानं पुत्रघ्नमिति केशव ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
श्वय़ोनौ तु स सम्भूतस्त्रीणि वर्षाणि जीवति |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
शय़नं कल्पय़ामासुर्भीष्माय़ामिततेजसे |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
शय़नं चैकपार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
शय़नं तत्र वै कॢप्तं स्पर्ध्यास्तरणसंवृतम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
शय़नं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तय़म् ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
शय़नं भोजनं यानं मणिरत्नमथो धनम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
शय़नस्यानुरूपं हि शीघ्रं वीर प्रय़च्छ मे ||
३९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
शय़नादुपसम्भ्रान्त इय़ेषोत्पतितुं ततः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
शय़नानि च मुख्यानि परिषेकाश्च पुष्कलाः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
शय़नानि च मुख्यानि भोज्यानि विविधानि च |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
शय़नानि महार्हाणि योषितश्च मनोरमाः |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शय़नानि महार्हाणि वासांस्याभरणानि च |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
शय़नानि यथास्वानि भेजिरे पुरुषर्षभाः ||
१०१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शय़नान्युचिताः सर्वे मृदूनि विमलानि च |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
शय़नासनसम्वाधं गन्धैश्च परमैर्युतम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
शय़नासनय़ानानि विविधानि महान्ति च |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
शय़नीय़ं पुरा यस्य स्पर्ध्यास्तरणसंवृतम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
शय़नीय़ानि शुभ्राणि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च |
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
शय़ने चाप्यनुज्ञातः सुप्त उत्थाप्यतेऽवशः ||
१४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
शय़ने नागभोगाढ्ये ज्वालामालासमावृते ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
शय़ने सुखसंस्पर्शे शिश्ये यदुसुखावहः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
शय़नेषु परार्ध्येषु ये पुरा वारणावते |
१५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
शय़ानं चानुशय़ति तिष्ठन्तं चानुतिष्ठति |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
९
सूत उवाच
शय़ानं तत्र चापश्यड्डुण्डुभं वय़सान्वितम् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
नारद उवाच
शय़ानं धार्तराष्ट्रं तु स्तम्भिते सलिले तदा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
शय़ानं नाशकं त्रातुं भीष्ममाय़ोधने हतम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
शय़ानं भरतश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
शय़ानं भिन्नमर्माणं दुर्मुखं शोणितोक्षितम् |
२२ क