वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
षट्कर्मनिरता विप्राः क्षत्रिय़ा रक्षणे रताः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
षट्कर्मसम्प्रवृत्तस्य आश्रमेषु चतुर्ष्वपि |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
षट्कर्मस्वनिवृत्तश्च नप्रवृत्तश्च सर्वशः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
षट्कर्मा वर्तय़त्येकस्त्रिभिरन्यः प्रवर्तते |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
षट्कालः सागरो गङ्गा स्रवन्त्योऽथ मरुद्गणाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
षट्कृत्वस्तत्तु निक्षिप्तमग्ने रेतः कुरूत्तम |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
षट्चैनं कुमाराः परिवर्तय़न्ति |
१६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
षट्त्रिंशद्भिस्ततो भल्लैर्निशितैस्तिग्मतेजनैः |
२३ क
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
षट्त्रिंशे त्वथ सम्प्राप्ते वर्षे कौरवनन्दनः |
१ क
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
षट्त्रिंशेऽथ ततो वर्षे वृष्णीनामनय़ो महान् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
षट्पञ्चाशतमष्टौ च सप्तत्रिंशतमित्युत |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
षट्पथं नवसंस्थानं निवेशं चक्रिरे द्विजाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
षट्पदाघूर्णितलतं लक्ष्म्या परमय़ा युतम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४
शल्य उवाच
षट्पदैरुपगीतानि प्रफुल्लानि सहस्रशः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
षट्पदैरुपगीतैश्च माधवाप्रतिमो गिरिः ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
षट्पदैर्वाप्यनाकीर्णस्तस्मिन्वै काननेऽभवत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
षट्पदोद्गीतनिनदैर्विघुष्टं सामगैरिव |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
षट्पदोद्गीतसङ्घुष्टं नानाद्विज गणाय़ुतम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
षट्पुत्रा जज्ञिरेऽथैलादाय़ुर्धीमानमावसुः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
षट्पुत्रान्सोऽप्यजनय़त्तिसृषु स्त्रीषु भारत ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
षट्प्राणिनो निधाय़ेह द्रवामोऽनभिलक्षिताः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
षट्शतानि च पूर्णानि विष्कम्भो जम्वुपर्वतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
षट्शिरा द्विगुणश्रोत्रो द्वादशाक्षिभुजक्रमः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
षट्शिरोऽभ्यन्तरं राजन्नित्यं मातृगणार्चितम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
षट्षष्टिर्हि सहस्राणि ऋषीणां भावितात्मनाम् |
१०८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
षट्सहस्रान्वरान्वीरान्पुनर्दशशतान्वरान् |
५० क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
षट्सहस्रैर्हय़ैः शिष्टैरपाय़ाच्छकुनिस्ततः ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
षट्सहस्रैर्हय़ैः शिष्टैरपाय़ाच्छ्रान्तवाहनम् ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
षट्साहस्रा भारत राजपुत्राः; स्वर्गाय़ लोकाय़ रथा निमग्नाः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
षट्सु वर्त्मसु तेजोऽग्नेः सकलं निहितं प्रभो ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
षट्सु वीरेषु संसक्तो दौःशासनिवशं गतः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
षट्सु शम्यानिपातेषु वल्मीकादिति निश्चय़ः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
षट्सूर्येवावभौ पृथ्वी पाण्डवैः सत्यविक्रमैः ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
षडग्निनाथ यज्ञेन सोऽय़जद्दक्षिणावता |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
षडङ्गविन्महाप्राज्ञः पैप्पलादिः स कौशिकः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७०
व्राह्मण्यु उवाच
षडङ्गश्चाखिलो वेद इमं गर्भस्थमेव हि |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
षडपध्वंसजाः के स्युः के वाप्यपसदास्तथा |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
षडपध्वंसजाश्चापि कानीनापसदास्तथा |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
षडपध्वंसजास्ते हि तथैवापसदाञ्शृणु ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
षडरत्नि धनुश्चास्य दृश्यतेऽप्रतिमं महत् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
षडशीतिः समानीताः शेषा राजंश्चतुर्दश |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
षडाधाने दक्षिणामाहुरेके; षडेवेमे ऋतवः कालचक्रम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
षडाननं कुमारं तं द्विषडक्षं द्विजप्रिय़म् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
षडानुपूर्व्या क्षत्रस्य विद्धि धर्म्याननिन्दिते ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
षडाय़तां सुपार्श्वोरुं त्रिपृथुं पञ्च संवृताम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
षडिन्द्रिय़ाणि विषय़ं समागच्छन्ति वै यदा |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
षडिन्द्रिय़ाण्युत षट्कृत्तिकाश्च; षट्साद्यस्काः सर्ववेदेषु दृष्टाः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
षडिमानि तु कर्माणि प्रोवाच भुवनेश्वरः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
षडिमान्पुरुषो जह्याद्भिन्नां नावमिवार्णवे |
६७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
षडिमे षट्सु जीवन्ति सप्तमो नोपलभ्यते |
७१ क