शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
षड्विंशो राजशार्दूल तदा वुद्धत्वमाव्रजेत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
षड्विंशोऽहमिति प्राज्ञो गृह्यमाणोऽजरामरः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
षड्विधं दुर्गमास्थाय़ पुराण्यथ निवेशय़ेत् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
षण्णां तासां ततः प्रीतः पावको गर्भधारणात् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
षण्णां तु प्रवरं तस्य शीर्षाणामिह शव्द्यते |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
षण्णां योधप्रवीराणां तावकानां पुरस्कृतम् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
षण्णां रसानां सारेण रसमेकमनुत्तमम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
राजो उवाच
षण्णाभेर्द्वादशाक्षस्य चतुर्विंशतिपर्वणः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
षण्णामात्मनि नित्यानामिन्द्रिय़ाणां प्रमाथिनाम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
षण्णामात्मनि वुद्धौ च जिताय़ां प्रभवत्यथ ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
षण्णामेकां पिवेद्धेनुं शताच्च मिथुनं हरेत् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
विशोक उवाच
षण्मार्गणानामय़ुतानि वीर; क्षुराश्च भल्लाश्च तथाय़ुताख्याः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
षण्मासं पदमास्थाय़ मासेनैकेन शुध्यति ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
षण्मासानभिसंरव्धा जिघांसन्तो युधां पतिम् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
षण्मासानशनं तस्य भगवानङ्गिराव्रवीत् |
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
षण्मासान्नित्ययुक्तस्य योगः पार्थ प्रवर्तते ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
षण्मासान्नित्ययुक्तस्य शव्दव्रह्मातिवर्तते ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
षण्मासान्वाय़ुभक्षा च स्थाणुभूता तपोधना ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
षण्मासान्सप्तमे मासि त्वं वीर निधनं गतः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
षष्टिं काणः शतं षण्ढः श्वित्री यावत्प्रपश्यति |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालय़न्ति ते |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिं गवां सहस्राणि कुरवः कालय़न्ति ते |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
षष्टिं रथांस्तानवजित्य सङ्ख्ये; धनञ्जय़ः प्रीतमना यशस्वी |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
षष्टिं वर्षसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
षष्टिं वर्षसहस्राणि दिवमावसते च सः ||
४६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
महेश्वर उवाच
षष्टिं वर्षसहस्राणि व्रह्मा चास्मै वरं ददौ ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
षष्टिं वर्षसहस्राणि षष्टिमेव शतानि च |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
षष्टिं वर्षसहस्राणि सोऽतप्यद्गौतमस्तपः |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
षष्टिं वर्षाणि धर्मात्मा वसुधां पालय़िष्यति ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिं शतसहस्राणि व्राह्मणानां महाभुजः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि; तथा अशीतिं परिवत्सराणि |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
षष्टिं सहस्राणि विभूषितानां; जाम्वूनदैराभरणैर्न तेन ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
षष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्याप्रतिमतेजसः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिः पुत्रसहस्राणि यं यान्तं पृष्ठतोऽन्वय़ुः |
१२३ क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
षष्टिः पुत्रसहस्राणि शूराः समरदर्पिताः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
षष्टिकोटिसहस्राणि प्रकर्षन्प्रत्यदृश्यत |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिदन्तावष्टदंष्ट्रौ मेघौघसदृशस्वनौ |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
षष्टिमाहुः शतान्यस्य वुधाः पौराणिकास्तथा ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिरुष्ट्रसहस्राणि शतानि द्विगुणा हय़ाः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिर्मुनिसहस्राणि शिष्यत्वं प्रतिपेदिरे |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
षष्टिश्च गावस्त्रिशताश्च धेनव; एकं वत्सं सुवते तं दुहन्ति |
६३ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिश्चाश्वसहस्राणि मत्स्यानामभिनिर्ययुः ||
२८ ग
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
षष्टिस्तानि सहस्राणि पुत्राणाममितौजसाम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
षष्टिस्तानि सहस्राणि षष्टिरेव शतानि च |
३० क
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
षष्टिस्तानि सहस्राणि सर्वे पृथुलवक्षसः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
षष्टिस्तानि सहस्राणि सागराणां महात्मनाम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
षष्टिह्रद उपस्पृश्य दानं नान्यद्विशिष्यते ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
षष्ट्या गजसहस्रैश्च प्रय़ाहि त्वं धनञ्जय़म् |
८३ क