भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
षष्ट्या च त्रिंशता चैव तदद्भुतमिवाभवत् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
षष्ट्या दन्तैर्युक्ताः शुक्लै; रष्टाभिर्दंष्ट्राभिर्ये |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
षष्ट्या नाराचैर्वासुदेवं विभेद; तदन्तरं सोमकाः प्राद्रवन्त ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
षष्ट्या रथसहस्रैस्तु नागानामय़ुतेन च |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
षष्ट्या वीरो नदन्हृष्टो विव्याध रणमूर्धनि ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
षष्ट्या शतैश्च नवभिः शराणामग्निवर्चसाम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
षष्ट्या शराणां तं द्रौणिस्तिग्मधारैः सुतेजनैः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
षष्ट्या शराणां विव्याध वाह्वोरुरसि चानघ ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
षष्ट्या शरैः संय़ति तैलधौतै; र्जघान तानप्यथ पृष्ठगोपान् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
षष्ठं छागमय़ं वक्त्रं स्कन्दस्यैवेति विद्धि तत् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
षष्ठः परिवहो नाम स वाय़ुर्जवतां वरः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
षष्ठः शिष्यो न ते ख्यातिं गच्छेदत्र प्रसीद नः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
षष्ठकालोपवासेन मासमुष्य महालय़े |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
षष्ठकालोपवासेन मुच्यते व्रह्महत्यया ||
१३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
षष्ठमंशं क्रतोस्तस्य भूमिदानं प्रचक्रिरे ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
षष्ठमध्ययनं नाम तेषां कस्मिन्प्रतिष्ठितः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
षष्ठमेतन्महापर्व भारते परिकीर्तितम् |
१५८ क
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
षष्ठस्तु चेतना नाम मन इत्यभिधीय़ते |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
षष्ठस्तु मतिमान्यो वै तेषामासीन्महासुरः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
षष्ठस्य वर्णस्य परा गतिर्या; सिद्धा विशिष्टस्य गतक्लमस्य ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
षष्ठीं यां व्राह्मणाः प्राहुर्लक्ष्मीमाशां सुखप्रदाम् |
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
षष्ठीमङ्गिरसः कन्यां पुण्यामाहुर्हविष्मतीम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
षष्ठे काले कदाचिच्च तस्याहारो न विद्यते |
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
षष्ठे काले तदा विप्रो भुङ्क्ते तैः सह सुव्रतः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
षष्ठे काले तु कौन्तेय़ नरः संवत्सरं क्षपेत् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
षष्ठे काले न हि मय़ा सा शक्या द्रष्टुमद्य वै ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
षष्ठे काले ममाहारः प्राप्तोऽय़मनुजस्तव |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
राजो उवाच
षष्ठे काले ममाहारो विहितो द्विजसत्तम |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
षष्ठे काले व्रतवतीं शीलशौचसमन्विताम् |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
षष्ठे च त्वां तथा काले द्रौपद्युपगमिष्यति ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
षष्ठे षष्ठे तदा काले वभूव मितभोजनः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
षष्ठेन च ध्वजं राज्ञः सप्तमेन च कार्मुकम् |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
षष्ठेन च शिरः काय़ाच्छरेण रथसारथेः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
षष्ठेऽहनि समाजग्मुर्न चाकम्पत जाजलिः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
षष्ठो हरिगिरिर्नाम षडेते पर्वतोत्तमाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४६
भीष्म उवाच
षष्ठो हि दिवसस्तेऽद्य प्राप्तस्येह तपोधन |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
षष्ठ्यां कृतार्थोऽभूद्यस्मात्तस्मात्षष्ठी महातिथिः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
युधिष्ठिर उवाच
षाडवान्रसय़ोगांश्च तथेच्छन्ति यथामिषम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
षाड्गुण्यं च त्रिवर्गं च त्रिवर्गमपरं तथा |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
षाड्गुण्यगुणकल्पश्च सेनानीतिस्तथैव च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
षाड्गुण्यगुणदोषांश्च नित्यं वुद्ध्यावलोकय़ेत् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
षाड्गुण्यगुणसारैषा स्थास्यत्यग्रे महात्मसु |
७९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
षाड्गुण्यमिति यत्प्रोक्तं तन्निवोध युधिष्ठिर |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
षाड्गुण्यस्य विधानेन यात्राय़ानविधौ तथा ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
षाण्मासिकं गर्भमहमेनं जीवय़िष्यामीति ||
९१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
षोडश स्त्रीसहस्राणि रत्नानि विविधानि च |
९ क
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
षोडशस्त्रीसहस्राणि वासुदेवपरिग्रहः |
६ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
षोडशस्त्रीसहस्राणि वासुदेवपरिग्रहः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
षोडशानां सहस्राणां वधूनां केशवस्य ह |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
षोडशाष्टौ चतुर्विंशत्सहस्रं भारलक्षणम् ||
१७ ख