वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
स आत्मा पुरुषव्याघ्र भ्रुवोरन्तरमाश्रितः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
स आदिः स मध्यः स चान्तः प्रजानां; स धाता स धेय़ः स कर्ता स कार्यम् |
८९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
स आश्रमपदद्वारि वृक्षमूले महातपाः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
स आसीद्द्वादशसमो द्वादशाहेन पार्थिव ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
धृतराष्ट्र उवाच
स इदानीमनुप्राप्तो मन्ये सञ्जय़ शोचतः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
स इमामापदं प्राप्य कथं घोरां तरिष्यसि ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
स इहर्द्धिं परां प्राप्य प्रेत्य नाके महीय़ते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
स इहाकीर्तिसंय़ुक्तो मृतो नरकमाप्नुय़ात् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
स उञ्छवृत्तिः तं प्रेक्ष्य क्षुधापरिगतं द्विजम् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
स उत्कृत्य मृतानां वै मांसानि द्विजसत्तमः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
स उत्पादय़ितापत्यं वधार्थं त्रिदशद्विषाम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स उपाध्याय़ं प्रत्युवाच |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स उपाध्याय़ं प्रत्युवाच |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स उपाध्याय़वचनादरक्षद्गाः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स उपाध्याय़ेन सन्दिष्ट आरुणिः पाञ्चाल्यस्तत्र गत्वा तत्केदारखण्डं वद्धुं नाशक्नोत् ||
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स उपाध्याय़ेनानुगृहीतः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स उपाध्याय़ेनानुज्ञात उत्तङ्कः क्रुद्धस्तक्षकस्य प्रतिचिकीर्षमाणो हास्तिनपुरं प्रतस्थे ||
१७७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स उपाध्याय़ेनानुज्ञातः समावृत्तस्तस्माद्गुरुकुलवासाद्गृहाश्रमं प्रत्यपद्यत |
८३ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
स उपालभ्य भीष्मं च धर्मराजं च संसदि |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
स उवाच तदा तां स्त्रीं स्नानोदकमिहानय़ |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
स ऊर्ध्वरेतास्तपसि प्रसक्तः; स्वाध्याय़वान्वीतभय़क्लमः सन् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
स ऋषीन्वाहय़ामास वरदानमदान्वितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
स एक एकामासाद्य कन्यां तामरिमर्दनः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एकं शिष्यमारुणिं पाञ्चाल्यं प्रेषय़ामास |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
स एकः समरे तस्थौ किरन्वहुविधाञ्शरान् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स एकदा कक्षगतो महात्मा; तृप्तो विभुः खाण्डवे धूमकेतुः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
पितर ऊचुः
स एकाग्रं मनः कृत्वा निश्चलो योगमास्थितः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स एकय़ुक्चक्रमिदं त्रिनाभि; सप्ताश्वय़ुक्तं वहते वै त्रिधामा |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एनं पुरुषः पुनरुवाच |
१५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
स एनं रणमध्यस्थं शरैः पातय़िता भुवि ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
स एनं वाग्भिरुग्राभिस्ततक्ष पुरुषर्षभ ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
स एनं विजने दृष्ट्वा पांसुभिः कर्दमेन च |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
स एनमनय़द्वद्ध्वा दिशं पितृनिषेविताम् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स एनमभिवाद्योवाच |
१०७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
स एनमिषुजालेन लघुत्वाच्छीघ्रविक्रमः |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
स एनान्मन्युनाविष्टो ध्रुवं वक्ष्यत्यसंशय़म् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
स एव एकस्तव पुत्रसेनां; जघान दैत्यानिव वज्रपाणिः ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स एव कालं विभजन्नुदेति; तस्योत्तरं दक्षिणं चाय़ने द्वे |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
स एव खलु दारुभ्यो यदा निर्मथ्य दीप्यते |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
स एव च यदा राजन्वह्निर्जातवलः पुनः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
स एव चेतसा तेन हतो लिप्येत सर्वदा |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
स एव तस्य कुरुते कार्याणामनुशासनम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
स एव द्रोणहन्ता ते दर्पं भेत्स्यति पार्षतः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
स एव धर्मः सोऽधर्मस्तं तं प्रतिनरं भवेत् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
पाण्डुरु उवाच
स एव धर्मो राज्ञां तु तद्विद्वान्किं नु गर्हसे ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
स एव निरय़स्तस्य नासौ तस्मात्प्रमुच्यते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
स एव फलमश्नाति त्रिषु लोकेषु मूर्तिमान् ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
स एव भक्तः स गुरुः स भृत्यः; स वै पिता स च माता सुहृच्च |
२९ क