वन पर्व
अध्याय
१९४
मधुकैटभावू ऊचतुः
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्ध्यावां पुरुषोत्तम ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सत्ये प्रतिष्ठितः कृष्णः सत्यमत्र प्रतिष्ठितम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
सत्ये प्रय़तितव्यं वः सत्यं हि परमं वलम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
सत्ये रतानां सततं दान्तानामूर्ध्वरेतसाम् ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
सत्ये वै व्राह्मणस्तिष्ठन्व्रह्म पश्यति क्षत्रिय़ |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
सत्ये व्यवस्थितो धर्मो व्राह्मणेष्ववतिष्ठते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
सत्ये स्थिता महात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
सत्ये स्थितानां वेदविदां महात्मनां; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
सत्ये स्थितास्तस्य महारथस्य; सत्यव्रतस्यागमनप्रतीक्षाः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
सत्ये स्थितास्ते नरदेव सर्वे; दुर्योधनं स्थापय़ त्वं नरेन्द्र ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
सत्ये स्थितास्मि दाने च व्रते तपसि चैव हि |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
सत्ये स्थितो धर्मपरो जितेन्द्रिय़ः; शूरो दृढं प्रीतिरतः सुराणाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
सत्ये हि राजा निरतः प्रेत्य चेह च नन्दति ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सत्येन च महाभाग तुष्टोऽस्मि तव सर्वशः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
सत्येन तपसा चैव विदित्वा सङ्क्षय़ं ह्यहम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
सत्येन ते शपे कृष्ण तथैवाय़ुधमालभे ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सत्येन ते शपे राजन्प्रसादेन तवैव च |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
सत्येन तेऽप्यजय़ंस्तात लोका; न्नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
सत्येन देवान्प्रीणाति पितॄन्वै व्राह्मणांस्तथा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
सत्येन धर्मेण च वार्यमाणः; कालं प्रतीक्षत्यधिको रणेऽन्यैः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
सत्येन धर्मेण यथार्हवृत्त्या; ह्रिय़ा तथा सर्वभूतान्यतीत्य |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
सत्येन धार्यते लोकः स्वर्गं सत्येन गच्छति ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
सत्येन पृष्टः प्रव्रूहि यदि तान्वेत्थ शंस नः ||
४४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
सत्येन मारुतो वाति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
सत्येन मे द्यौश्च वसुन्धरा च; तथैवाग्निर्ज्वलते मानुषेषु |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
सत्येन वाय़ुरभ्येति सत्येन तपते रविः ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
सत्येन विधृतं सर्वं सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
सत्येन वै शपे देवि कर्तास्मि वचनं तव ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
सत्येन संवर्धय़ति दमेन निय़मेन च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
सत्येन सम्परिष्वज्य सन्दिष्टो गम्यतामिति ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
सत्येन सूर्यस्तपति सत्येनाग्निः प्रदीप्यते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
सत्येन हि स्थिता धर्मा उपपत्त्या तथापरे |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सत्येषुमथ चादत्त योधानां मिषतां ततः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
सत्येषुरृषभो राहुः कपिलाश्वो विरूपकः |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
सत्यो भवतु कल्याण एष वादो मनीषिणाम् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
सत्रं चेदं महद्विप्रा मुनेर्द्वादशवार्षिकम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
५१
आस्तीक उवाच
सत्रं ते विरमत्वेतत्स्वस्ति मातृकुलस्य नः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
५१
सूत उवाच
सत्रं ते विरमत्वेतन्न पतेय़ुरिहोरगाः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
सत्रमास्ते महाभागो रैभ्ययाज्यः प्रतापवान् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
सत्रमिष्टीकृतं नाम पुरा वर्षसहस्रिकम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
सत्रमिष्टीकृतं नाम समुपास्ते महातपाः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
सत्राणि दानानि तथा संय़ोगा वित्तसञ्चय़ाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सत्रावसानमासाद्य गोसहस्रफलं लभेत् ||
१३३ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
सत्रे समृद्धेऽति रथस्य राज्ञो; वेदीतलादुत्पतिता सुता या |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
सत्रेण ते जनक तुल्यकालं; तदर्थं ते प्रहिता मे द्विजाग्र्याः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सत्रेण नूनं छन्नं हि चरन्तं पार्थमर्जुनम् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
सत्वरं चरणे राजंस्तस्य वाहान्महात्मनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
सत्सु नित्यं सतां धर्मस्तमास्थाय़ न नाशय़ेत् ||
१४ ख