अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
युधिष्ठिर उवाच
सत्स्त्रीणां समुदाचारं सर्वधर्मभृतां वर |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
सदंशकीटमशके सपूतिकृमिमूषके |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
सदः सपत्नीसदनं साग्नीध्रमपि चोत्तरम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं; कांस्योपदोहां द्रविणोत्तरीय़ाम् |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सदण्डशूला दीप्ताग्राः शीर्यमाणाः समन्ततः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
सदण्डाः सोल्मुका राजञ्शीर्यमाणाः समन्ततः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
सदश्चान्तरय़ोधाग्निराग्नीध्रश्चोत्तरां दिशम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
कुन्त्यु उवाच
सदश्व इव स क्षिप्तः प्रणुन्नो वाक्यसाय़कैः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
सदश्व इव सम्वाधे विषमे क्षेममर्हति ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
सदश्ववत्समाधावद्वभाषे तदनन्तरम् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सदश्वाविव हेषन्तौ वृंहन्ताविव कुञ्जरौ ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
सदश्वैरुपसम्पन्नाः पृष्ठतोऽनुय़युः सदा ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
सदश्वय़ुक्तेन रथेन कर्णो; मेघस्वनेनार्क इवामितौजाः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
सदश्वय़ुक्तेन रथेन निर्या; ल्लोकान्विसिस्मापय़िषुर्नृवीरः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
सदसच्चाशुता चैव मनसो नव वै गुणाः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
सदसच्चैव तत्सर्वमव्यक्तं त्रिगुणं स्मृतम् |
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
सदसच्चैव यत्प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
सदसद्ग्रथितं विश्वं विश्वाङ्गे विश्वकर्मणि ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सदसद्भावय़ोगौ च गुणावन्यौ प्रकाशकौ ||
११० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सदसद्व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः ||
१३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
सदस्यश्चाभवद्व्यासः पुत्रशिष्यसहाय़वान् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
सदस्या अभवंस्तत्र सत्रे पारिक्षितस्य ह ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
सदस्या द्रोणशिष्याश्च कृपस्य च शरद्वतः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
सदस्येभ्यो महाराज तेषु यज्ञेषु सप्तसु ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
सदस्यैः पूजितः सर्वैः सदस्यानभ्यपूजय़त् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
सदा कुमारो देवानां सेनापत्यमवाप्तवान् ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
सदा क्षुतं च वातं च ष्ठीवनं चाचरेच्छनैः ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
सदा च तत्र पर्जन्यः सम्यग्वर्षी न संशय़ः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२३६
जनमेजय़ उवाच
सदा च पौरुषौदार्यैः पाण्डवानवमन्यतः ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
सदा च प्रातरुत्थाय़ कृतजप्यः शुचिर्नृपः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सदा च वाय़वो वान्ति नित्यं वर्षति वासवः |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
सदा चापररात्रं ते भवेत्कार्यार्थनिर्णय़े |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
सदा तपस्वी भवति मधुमांसस्य वर्जनात् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा त्रिषवणस्नाय़ी व्रह्मचार्यनसूय़कः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
सदा त्वदर्थं राधेय़ः स कथं निहतस्त्वय़ा ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा दादश मासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् |
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
सदा देवमनुष्याणामसुराणां च गालव |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
सदा देवाः साधुभिः संवदन्ते; न मानुषं विषय़ं यान्ति द्रष्टुम् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासांस्तु जितात्मा विजितेन्द्रिय़ः ||
१११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ||
१०७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासांस्तु निय़तो निय़ताशनः ||
१०३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत् ||
९९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासांस्तु मिताहारो जितेन्द्रिय़ः ||
९३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासांस्तु सत्यवादी धृतव्रतः ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
८७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
९० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै जुह्वानो जातवेदसम् ||
९६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै देवसत्रफलं लभेत् ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सदा द्वादश मासान्वै महामेधफलं लभेत् ||
६० ख