सभा पर्व
अध्याय
६४
अर्जुन उवाच
सन्तः प्रतिविजानन्तो लव्ध्वा प्रत्ययमात्मनः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
सन्तः प्रतिविजानन्तो लव्ध्वा प्रत्ययमात्मनः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां; सतां सदैवामरराजकल्प |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
सन्तः सतः पूजय़न्तीह लोके; नासाधवः साधुवुद्धिं लभन्ते ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
सन्तः सत्पथनित्या ये ते यान्ति परमां गतिम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
सन्तः स्वर्गजितः शुक्लाः संनिविष्टाश्च सत्पथे ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तता गतिरेतस्य नैष तिष्ठति पाण्डव |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
सन्ततार पुनस्तेन सेतुना मकरालय़म् ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सन्ततार सुदुस्तारां भीमसेनो महावलः ||
९५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
सन्ततिश्च प्रवृत्तिश्च जन्म मृत्युः पुनर्भवः ||
१९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
सन्तन्वाना यथा यान्ति तथा देहाः शरीरिणाम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तप्तः शोकदुःखाभ्यां राज्ञो वाक्षल्यपीडितः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
सन्तप्तानि च भूतानि विषादं जग्मुरुत्तमम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
सन्तप्तास्तपसा तस्या देवाः सर्षिमहोरगाः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तप्यमाना अभितो वाशमानाभिधावती ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
सन्तरेद्येन दुर्गाणि परत्रेह च मानवः ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तर्ज्यमानमसकृद्भर्त्रा युद्धार्थिना विभो ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
सन्तर्प्य व्राह्मणान्साधूँल्लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सन्तर्पय़ति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तर्पय़न्तः सततं वन्येन हविषा द्विजान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तर्पय़ामास तथैव कृष्णा; ते चापि विप्राः सह लोमशेन ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
सन्तश्चक्रचराः पुण्याः सोमलोकचराश्च ये ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
सन्तस्तार क्षितिं क्षिप्रं कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सन्तस्तार क्षितिं क्षिप्रं विनालैर्नलिनैरिव ||
४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सन्तस्तार शुभां शय़्यां दर्भैर्वैडूर्यसंनिभैः ||
१ ग
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
सन्तस्त्वेवाप्यमित्रेषु दय़ां प्राप्तेषु कुर्वते ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
सन्तानं नर्तनं घोरमास्यमोदकमष्टमम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
अश्वपतिरु उवाच
सन्तानं हि परो धर्म इत्याहुर्मां द्विजातय़ः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
सन्तानकवनैः फुल्लैः करवीरवनैरपि |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
सन्तानकवनैः फुल्लैर्वृक्षैश्च समलङ्कृताः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
पितर ऊचुः
सन्तानप्रक्षय़ाद्व्रह्मन्नधो गच्छाम मेदिनीम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
सन्तानप्रक्षय़ाद्व्रह्मन्पतामो निरय़ेऽशुचौ ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
गान्धार्यु उवाच
सन्तानमावय़ोस्तात वृद्धय़ोर्हृतराज्ययोः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तानश्चैव पिण्डश्च प्रतिष्ठास्यत्यसंशय़म् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तानस्याविनाशाय़ कामय़े भद्रमस्तु ते |
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
सन्तानहेतोरिति ते तमूचुर्व्रह्मवादिनः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
सन्तानात्तव सन्तानं मम विप्र भविष्यति |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
सन्तानादीनि कर्माणि कृत्वा सोमं निषेव्य च ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
सन्तानार्थं कुलस्यास्य यद्वा विदुर मन्यसे ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
सन्तानार्थं महाभाग भार्यासु मम मानद |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तानिका च कौरव्य कमला च महावला ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तापं जहि दुर्धर्ष मा च शोके मनः कृथाः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
सन्तापं परमं जग्मुरस्त्रतेजोभिपीडिताः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तापं परमं जग्मुर्मुनय़ोऽथ परन्तप ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
सन्तापद्वेषलोभांश्च शत्रूंश्च लभते नरः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
सन्तापमगमत्तीव्रं पुत्रशोकपराय़णः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
सन्तापमगमत्तीव्रं सा सोढुं न शशाक ह ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
सन्तापश्च न कर्तव्यः स्वगृहे वर्तते भवान् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
सन्तापादिह सम्प्राप्तः पावकप्रभवादहम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
सन्तापाद्भ्रश्यते ज्ञानं सन्तापाद्व्याधिमृच्छति ||
४२ ख