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शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
सन्तापाद्भ्रश्यते रूपं धर्मश्चैव सुरेश्वर ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
सन्तापाद्भ्रश्यते रूपं सन्तापाद्भ्रश्यते वलम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
सन्तापितः पिता माता वय़ं चैव नृपात्मज |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
सन्तापिताश्च ये केचिद्व्यसनौघप्रतीक्षिणः |
७५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
सन्तापोऽप्रत्ययश्चैव व्रतानि निय़माश्च ये |
९ क
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तापय़ति नः सर्वानसौ साधु निवार्यताम् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तापय़ति वैतस्य पूर्वप्रेतान्पितामहान् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
सन्तापय़त्यभ्यधिकं तु रामा; च्छापोऽद्य मां व्राह्मणसत्तमाच्च ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
सन्तापय़न्तावन्योन्यं दीप्तैः शरगभस्तिभिः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
सन्तापय़न्रणे पार्थं भूतान्यन्तर्हितानि च ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय २०७
मार्कण्डेय़ उवाच
सन्तापय़न्स्वप्रभय़ा नाशय़ंस्तिमिराणि च ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
सन्तापय़ामास भृशं देवेन्द्रमिति नः श्रुतम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
सन्ति केचिन्महावर्षा दुर्गाः केचिद्दुरासदाः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
सन्ति गोय़ोनय़श्चात्र सन्ति वानरय़ोनय़ः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
सन्ति चाशीविषनिभाः सन्ति मन्दास्तथापरे |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
सन्ति चैषामतिशठास्तथान्येऽतितपस्विनः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
सन्ति दानवकन्याश्च दैत्यानां चापि योषितः ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
सन्ति देवनिकाय़ाश्च सङ्कल्पाज्जनय़न्ति ये |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
सन्ति नानाविधा लोका यांस्त्वं शक्र न पश्यसि |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
सन्ति नित्यहिमा देशा निर्वृक्षमृगपक्षिणः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
मातो उवाच
सन्ति नैकशता भूय़ः सुहृदस्तव सञ्जय़ |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
सन्ति नो ज्ञातय़स्तात येषां श्रोष्यन्ति पाण्डवाः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
सन्ति पुत्राः सुवहवो दरिद्राणामनिच्छताम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
सन्ति मे देवकन्याश्च राजर्षीणां तथाङ्गनाः |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ५३
दुर्योधन उवाच
सन्ति मे मणय़श्चैव धनानि विविधानि च |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय १
अर्जुन उवाच
सन्ति रम्या जनपदा वह्वन्नाः परितः कुरून् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ८७
यय़ातिरु उवाच
सन्ति लोका वहवस्ते नरेन्द्र; अप्येकैकः सप्त सप्ताप्यहानि |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
सन्ति लोके श्रद्दधाना मनुष्याः; सन्ति क्षुद्रा राक्षसा मानुषेषु |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय १४
द्रौपद्यु उवाच
सन्ति वह्व्यस्तव प्रेष्या राजपुत्रि वशानुगाः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
सन्ति वै पुरुषाः शूराः सन्ति कापुरुषास्तथा |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
सन्ति वै सिन्धुराजस्य सन्तुष्टा वहवो जनाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
सन्ति व्रह्मन्मय़ा गुप्ता नृषु क्षत्रिय़पुङ्गवाः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
सन्ति ह्यागतविज्ञानाः शिष्टाः शास्त्रविचक्षणाः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तिष्ठत प्रहरत तूर्णं विपरिधावत |
१ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तिष्ठस्व महावाहो मुहूर्तमपि भारत |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
सन्तीर्णः सर्वसङ्क्लेशान्प्रसन्नात्मा विकल्मषः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तीर्य सरय़ूं रम्यां दृष्ट्वा पूर्वांश्च कोसलान् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
सन्तुष्टः संमतः सत्यः शौटीरो द्वेष्यपापकः |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३४
श्रीभगवानु उवाच
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय़ः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९५
वामदेव उवाच
सन्तुष्टपुष्टसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
सन्तुष्टभृत्यसचिवाः कृतज्ञाः प्रिय़वादिनः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
सन्तुष्टभृत्यसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
सन्तुष्टश्चाप्रमत्तश्च यज्ञदानतपोरतिः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तुष्टा नैष्ठिकं वाक्यं यथावद्वक्तुमर्हथ ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
सन्तुष्टाश्च क्षमाय़ुक्तास्तान्नमस्याम्यहं विभो ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तेजय़ंस्तदा वाग्भिर्मातरिश्वेव पावकम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
सन्तो गतिर्भूतभव्यस्य राज; न्सतां मध्ये नावसीदन्ति सन्तः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
सन्तो दिग्जलमाकाशं गौरन्नं प्रार्थना विषम् |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
सन्तो यां गतिमिच्छन्ति प्राप्तस्तां तव पुत्रकः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां; देवा लोकाश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ||
५५ ख