वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
सन्तो हि सत्येन नय़न्ति सूर्यं; सन्तो भूमिं तपसा धारय़न्ति |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
सन्तोष इत्यत्र शुभमपवर्गे प्रतिष्ठितम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
सन्तोषणीय़रूपोऽसि लोभाद्यदभिमन्यसे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
सन्तोषमूलस्त्यागात्मा ज्ञानाधिष्ठानमुच्यते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
सन्तोषश्चैकचर्या च कूटस्थं श्रेय़ उच्यते ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
सन्तोषो वै श्रिय़ं हन्ति अभिमानश्च भारत |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
सन्तोषो वै श्रिय़ं हन्ति तथानुक्रोश एव च |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
सन्तोषो वै स्वर्गतमः सन्तोषः परमं सुखम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
सन्तोऽसतां नानुवर्तन्ति चैत; द्यथा आत्मैषामनुकूलवादी ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
सन्त्यक्तात्मा समरेष्वातताय़ी; शस्त्रैश्छिन्नो दस्युभिरर्द्यमानः |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
सन्त्यक्तात्मा समारुह्य कृष्णवर्त्मन्युपाविशत् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
सन्त्यज्य मत्स्यरूपं सा दिव्यं रूपमवाप्य च |
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सन्त्यज्य मनसा प्राणान्मद्राधिपमय़ोधय़त् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
सन्त्यज्य मूढा वर्तन्ते ततो यान्त्यश्रुतीपथम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
सन्त्यज्य राज्यमृद्धं ते लोकोऽय़ं किं वदिष्यति ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
सन्त्यज्य संय़ुगे भीमं द्रोणानीकमुपाद्रवत् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
सन्त्येव मे व्राह्मणेभ्यः कृतानि; भावीन्यथो नो वत वर्तय़न्ति |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सन्त्येव वृद्धाः साधवो धार्तराष्ट्रे; सन्त्येव पापाः पाण्डव तस्य विद्धि |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
सन्त्येषां सिंहसत्त्वाश्च व्याघ्रसत्त्वास्तथापरे |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
सन्त्रस्तरूपस्त्राणार्थी त्वत्तो भीतो महाद्विज |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सन्त्रस्ता पाण्डवी सेना वातवेगहतेव नौः ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
सन्त्रस्ताः समकम्पन्त त्वदीय़ानां महारथाः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
सन्त्रासाज्जामदग्न्यस्य सोऽपरान्तं महीतलम् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
सन्त्रासय़न्ननीकानि तलशव्देन मारिष |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
सन्दधत्योऽसुखाविष्टा मूर्छन्त्येताः पुनः पुनः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
सन्दधद्विसृजंश्चेषून्निर्विशेषमदृश्यत ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
सन्दधानस्य विशिखाञ्शीघ्रं चैव विमुञ्चतः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
सन्दधीत न चानार्यैर्विगृह्णीय़ान्न वन्धुभिः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
सन्दधीत नृपस्तैश्च राष्ट्रं धर्मेण पालय़न् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
सन्दधे कार्मुके तस्मिञ्शरमाशीविषोपमम् |
११४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
सन्दधे त्वाष्ट्रमस्त्रं स स्वय़ं त्वष्टेव मारिष ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
सन्दधे निशितं वाणं गिरीणामपि दारणम् |
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
सन्दधे परवीरघ्नः कालाग्न्यनिलवर्चसम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
सन्दधे परवीरघ्नो वीरकेतुरथं प्रति ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
सन्दधे वलवत्कृष्य घोरं शत्रुनिवर्हणम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
सन्दधेऽर्धं महीं कृत्स्नां दिवमर्धं प्रजापतिः ||
४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
सन्दर्भं भारतस्यास्य कृतवान्धर्मकाम्यया ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
सन्दर्शनं च कृष्णस्य संवादश्चैव सत्यया |
१२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
सन्दर्शनरुचिर्वाक्यमाज्ञापूर्वं वदिष्यति ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
सन्दर्शने सत्पुरुषं जघन्यमपि चोदय़ेत् |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
सन्दर्शय़ामास तदा स्म लोका; न्सर्वांस्तदा पुण्यकृतां द्विजेन्द्र ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
ऋषभ उवाच
सन्दर्शय़ित्वा चात्मानं दिव्यमद्भुतदर्शनम् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
सन्दर्शय़िष्यन्नस्त्राणि चित्राणि च लघूनि च |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
सन्दश्य दशनैरोष्ठं सृक्किणी परिसंलिहन् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
सन्दश्यमानोऽपि तथा कृमिणा तेन भारत |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
सन्दष्टोष्ठं भ्रुकुटीसंहतभ्रुवं; वृकोदरो नाम पतिर्ममैषः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
सन्दष्टोष्ठं विवृत्ताक्षं फलं वृन्तादिव च्युतम् |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
सन्दष्टौष्ठपुटैः क्रोधात्क्षरद्भिः शोणितं वहु ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
सन्दिग्धं विजय़ं दृष्ट्वा विजय़ेप्सुः सुरेश्वरः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
सन्दिदेश च तान्भीमो वसु दत्त्वा च पुष्कलम् |
२ क