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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
सन्धीय़मानं भुजगं दृष्ट्वा कर्णेन माधवः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७६
भृगुरु उवाच
सन्धुक्षणार्थं भूतानां सृष्टं प्रथमतो जलम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
सन्धेय़ानपि सन्धत्स्व विरोध्यांश्च विरोधय़ ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
सन्धेय़ान्पुरुषान्राजन्नसन्धेय़ांश्च तत्त्वतः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
सन्धौ तु समनुप्राप्ते त्रेताय़ां द्वापरस्य च |
७८ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
सन्धौ सन्धौ संनिविष्टः सर्वेष्वपि तथानिलः |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
सन्ध्यर्थं राजपुत्रं च लिप्सेथा भरतर्षभ |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
सन्ध्या प्रवर्तते चेय़ं पश्चिमाय़ां दिशि प्रभो ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
सन्ध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेषु या |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
सन्ध्या समभवद्घोरा नापश्याम ततो रणम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सन्ध्यां कौन्तेय़मासीनमृषिभिः परिवारितम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
सन्ध्यां तिष्ठत्सु सैन्येषु सूर्यस्योदय़नं प्रति |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
सन्ध्यां तिष्ठन्तमभ्येत्य दाशार्हमपराजितम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
सन्ध्यां न भुञ्जेन्न स्नाय़ान्न पुरीषं समुत्सृजेत् |
१३३ क
आदि पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
सन्ध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिसृताः पुरा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
सन्ध्याकाल उपावृत्ते मुहूर्ते रम्यदारुणे ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सन्ध्याकालं समासाद्य प्रत्याहारमकारय़त् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
सन्ध्याकालाधिकवलैः प्रमुक्ता राक्षसैः क्षितौ ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
सन्ध्याकाले महाराज सैन्यानां श्रान्तवाहनः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
सन्ध्याकाले व्यतीते तु व्यपाय़ात्स च मे गुरुः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
सन्ध्यागतं सहस्रांशुमादित्यमुपतस्थिरे ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
सन्ध्यागतं सहस्रांशुमुपातिष्ठत भारत ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
सन्ध्यागताविवार्केन्दू समेष्ये पुरुषोत्तमौ ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
सन्ध्यामभिमुखा यान्ति तत्पराभवलक्षणम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
सन्ध्यामुपास्ते तेजस्वी सम्वन्धी तव मारिष ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
सन्ध्यामुपास्य ध्याय़न्तस्तमेव गतमानसाः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
सन्ध्यामुपास्स्व भगवन्नपः स्पृष्ट्वा यतव्रतः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सन्ध्यासन्ध्यांशय़ोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय़ ||
२१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
सन्ध्याय़ां न स्वपेद्राजन्विद्यां न च समाचरेत् |
११२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
सन्ध्येय़ं वर्तते रौद्रा न रात्रिर्दिवसं न च |
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
सन्धय़ामास तं जातं जरासन्धमरिन्दमम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
सन्नकण्ठोऽव्रवीद्वाक्यमभिवाद्य सुदीनवत् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय २९५
वैशम्पाय़न उवाच
सन्नद्धा धन्विनः सर्वे प्राद्रवन्नरपुङ्गवाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
सन्नात्मा नैव धर्मस्य न परस्य न चात्मनः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
सपक्षमिव नृत्यन्तं पार्श्वलग्नैः पय़ोधरैः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
सपक्षिगणसङ्घुष्टः सश्वापदसरीसृपः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
सपक्षिमृगसङ्घातं सश्वापदसरीसृपम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
सपक्षय़ोः पर्वतय़ोर्यथा सद्रुमय़ोः पुरा ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
सपताकं विचित्राङ्गं सोपासङ्गं महारथः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
सपताकध्वजहय़ः सानुकर्षवराय़ुधः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
सपताका ध्वजाः पेतुर्विशीर्णा इव पर्वताः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
सपताका रथा रेजुर्वैय़ाघ्रपरिवारणाः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
सपताका रथाश्चापि पाञ्चालानां महात्मनाम् ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
सपताकाध्वजं कर्णं सशल्यरथवाजिनम् |
७९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
सपताकान्सहारोहान्गिरीन्वज्रैरिवाभिनत् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
सपताकाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुः शरातुराः ||
१३४ ग
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
सपताकाश्च मातङ्गाः सध्वजाश्च महारथाः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
सपत्नवृद्धिं यत्तात मन्यसे वृद्धिमात्मनः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
सपत्नसहिते कार्ये कृत्वा सन्धिं न विश्वसेत् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सपत्नसेनां प्रममाथ दारुणो; महीं समग्रां विकचो यथा ग्रहः ||
५ ख