सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
स वै धर्मोऽस्त्वधर्मो वा स्ववृत्तौ भरतर्षभ ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
स वै पथि समागम्य भीष्मेणाक्लिष्टकर्मणा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
स वै परिमितप्रज्ञः स दान्तो द्विज उच्यते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
भीष्म उवाच
स वै पर्येति लोकांस्त्रीनथ साध्यानुपागमत् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
स वै पश्येद्यथाधर्मं न तथा चेदिराडय़म् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
स वै पुरो देवपुरस्य गन्ता; सहामरैः प्राप्नुय़ात्प्रीतिय़ोगम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
स वै प्रविशमानस्तु शूद्रेणान्धेन रक्षिणा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
स वै भ्रमन्महीं सर्वां क्वचिदासाद्य किञ्चन |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
वृत्र उवाच
स वै महात्मा पुरुषोत्तमो वै; तस्मिञ्जगत्सर्वमिदं प्रतिष्ठितम् ||
५७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
स वै मुक्तः पिप्पलं वन्धनाद्वा; स्वर्गाल्लोकाच्च्यवते श्राद्धमित्रः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
स वै मृत्युर्मृत्युरिवात्ति भूत्वा; एवं विद्वान्यो विनिहन्ति कामान् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
स वै यत्नेन महता तासु पुत्रं महीपतिः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
स वै यदा सत्त्वगुणेन युक्त; स्तमो व्यपोहन्घटते स्ववुद्ध्या |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स वै राजन्कृशो नाम न शरीरकृशः कृशः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
स वै रुद्रः स च शिवः सोऽग्निः शर्वः स सर्ववित् |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
स वै वहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते फलम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
स वै विचिन्तय़ामास सौवर्णान्प्रेक्ष्य वाय़सान् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
स वै विवदनाद्भीतः सुधन्वानं व्यलोकय़त् |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
स वै विवस्त्रो मलिनो विकचः पांसुगुण्ठितः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
स वै विष्णुश्च मित्रश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
स वै व्यसनमासाद्य गाधमार्तो न विन्दति ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
स वै व्रह्मविदां लोकान्प्राप्नुय़ाद्भरतर्षभ ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टो महातपाः |
९९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
स वै शोचामि सर्वान्वै ये युय़ुत्सन्ति पाण्डवान् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
स वै श्रान्तः क्षुधितः काश्यपस्ता; न्घोषान्समासादितवान्समृद्धान् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
स वै संवत्सरं पूर्णं मासं चैकं वनेऽवसत् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
स वै सम्पत्स्यते कर्ण सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
स वै सम्भाष्यमाणोऽन्यैः कोपाद्गिरिमुवाच ह |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
स वै सम्भृतसम्भारः सततं सुखमेधते ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
स वै सुखमवाप्नोति लोकेऽमुष्मिन्निहैव च ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
स वै सृजति भूतानि स एव पुरुषः परः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
स वै सृजति भूतानि स्थावराणि चराणि च ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
स वै हय़ानैक्षत तांस्ततस्ततः; समीक्षमाणं च ददर्श मत्स्यराट् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
स वैकल्यं महत्प्राप्य छिन्नधन्वा शरार्दितः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
स वैरं मनसा ध्यात्वा द्रोणो द्रुपदमव्रवीत् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स वैश्यः क्षत्रिय़कुले शुचौ महति जाय़ते ||
३३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स वैश्यः क्षत्रिय़ो जातो जन्मप्रभृति संस्कृतः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
स वो मनोगतं कामं देवः सम्पादय़िष्यति ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
स वोधय़ति चाप्येनं प्राप्तकालमधोक्षजः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
स व्यतीय़ाय़ यत्रोग्रं कर्णस्य सुमहद्वलम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
स व्यलीकं कथं प्राप्तो मत्तः परमवुद्धिमान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
स व्यासवाक्यमुदितो वनाद्द्वैतवनात्ततः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
स व्यूहराजो विवभौ देवासुरचमूपमः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
देवय़ान्यु उवाच
स व्रह्मचारी च तपोधनश्च; सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
स व्रह्मचारी विप्रर्षिः श्रीमान्गृत्समदोऽभवत् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
स व्रह्मपरमो धर्मस्तपश्च सदसच्च सः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
स व्रह्मय़ोगय़ुक्तात्मा सुखमक्षय़मश्नुते ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
स व्राह्मणं तपोय़ुक्तमुवाच दितिनन्दनः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
स व्राह्मणस्यांसदेशे निपपात महाद्युतिः ||
५० ग