chevron_left  सभाय़ामुत्थितंarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
सभाय़ामुत्थितं क्रुद्धं प्रस्थितं भ्रातृभिः सह |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
सभाय़ामृषय़स्तस्यां पाण्डवैः सह आसते |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
सभिण्डिपालपरिघान्सशक्तिवरकम्पनान् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
सभिण्डिपालाः सप्रासाः सशक्त्यृष्टिपरश्वधाः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
सभुशुण्ड्यश्मलगुडा साय़ुधा सपरश्वधा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
युधिष्ठिर उवाच
सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽय़ं केन निर्मितः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽय़ं केन निर्मितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सभृत्यदारो राजेन्द्र सुग्रीवो वानराधिपः |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
सभृत्यानां नरव्याघ्र रत्नवन्ति गृहाणि च ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २३७
दुर्योधन उवाच
सभृत्यामात्यपुत्राश्च सदारधनवाहनाः |
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
सभेरीशङ्खमुरजा साय़ुधा सपताकिनी |
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
सभेय़ं मे वहुरत्ना विचित्रा; शय़्यासनैरुपपन्ना महार्हैः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
सभेय़ं राजशार्दूल मनुष्येषु यथा तव ||
४१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
सभ्यानां नरदेवानां दृष्ट्वा कुन्तीसुतांस्तदा ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
सभ्यास्तु ये तत्र वभूवुरन्ये; ताभ्यामृते धार्तराष्ट्रेण चैव |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सभ्यास्त्वमी राजपुत्र्याह्वय़न्ति; मन्ये प्राप्तः सङ्क्षय़ः कौरवाणाम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
सभ्रातृपुत्रस्वजनस्य राज्ञ; स्तद्रोचतां पाण्डवानां शमोऽस्तु ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
व्यास उवाच
सभ्रातृवन्धोः कस्मात्त्वं वधमस्य चिकीर्षसि ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
सभ्रातॄनभिजानीहि वृत्त्या च प्रतिपादय़ ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
समं काय़शिरोग्रीवं धारय़न्नचलं स्थिरः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
समं गर्भं सुषुविरे कृत्तिकास्ता नरर्षभ ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
समं च चिच्छेद पराभिनच्च ता; ञ्शरोत्तमैर्द्वादशभिश्च सूतजम् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
समं च विषमं चैव न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
समं च विषमं चैव रथिनश्च वलावलम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ४०
भगवानु उवाच
समं तेजश्च वीर्यं च ममाद्य तव चानघ |
५३ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
समं तेजस्त्वय़ा चैव केवलं मनुजेश्वर ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
समं पर्यपतंश्चान्ये कुर्वन्तो महदाकुलम् ||
८५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
समं पुत्रेण मे षण्ढं व्रह्मवन्धो प्रशंससि ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
समं प्रहरतोस्तत्र शूरय़ोर्वलिनोर्मृधे |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
समं मतिमतां श्रेष्ठ समलोष्टाश्मकाञ्चनम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
समं युद्धे पाण्डवं युध्यमानं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
समं येषां दुकूलं च शाणक्षौमाजिनानि च ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
समं वचो निशम्येति वलदेवस्य धीमतः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
समं वत्स्यति सर्वासु चन्द्रमा मम शासनात् ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
समं वर्ततु सर्वासु शशी भार्यासु नित्यशः |
६७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वां शप्स्ये विरोचन ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वाधर्मो महान्स्पृशेत् ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
समं वस्तज्जीवितं मृत्युना स्या; द्यज्जीवध्वं ज्ञातिवधे न साधु ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
समं वा विषमं वापि नद्यो वा स्थावराणि वा ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
समं विमुञ्चतोः सङ्ख्ये विशिखान्दीप्ततेजसः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
शर्मिष्ठो उवाच
समं विवाहमित्याहुः सख्या मेऽसि पतिर्वृतः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
समं व्यूढेष्वनीकेषु संनद्धा रुचिरध्वजाः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
समं शशास भूतानि कामरागविवर्जितः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
समं सर्वेषु भूतेषु वर्तमानं नराधिप |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
समं हि तावप्रतिमप्रभावा; वन्योन्यमाजघ्नतुरुत्तमास्त्रैः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
समं हि भवतः सख्यं मय़ि चैवार्जुनेऽपि च |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
समं हि राज्यं प्रीतिश्च स्थानं च विजितात्मनाम् |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
समः कर्णस्य समरे यः स कर्णस्य पश्यतः |
२४ क