chevron_left  समदुःखसुखःarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
समदुःखसुखः क्षेमी मृत्युं हास्याम्यमर्त्यवत् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
समदुःखसुखा यस्य सहाय़ाः सत्यकारिणः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
समदुःखसुखो भूत्वा स परत्र महीय़ते ||
३६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
समदुःखसुखौ चैव नावां शङ्कितुमर्हसि ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
समदृश्यन्त पार्थस्य रथमार्गेषु भारत ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
समदृश्यन्त वेगेन पक्षवन्त इवाद्रय़ः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
समधीतं मय़ा व्रह्म व्रतानि चरितानि च |
२० क
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
समनह्यज्जरासन्धः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
समनुज्ञाप्य तान्सर्वानासीनान्मुनिरव्रवीत् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
समनुज्ञाप्य तु स तं कृष्णद्वैपाय़नं नृपः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
समनुज्ञाप्य दुर्धर्षं स्वां पुरीं यातुमर्हसि ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
समनुज्ञाप्य धर्मज्ञा राजानं भीममेव च |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
समनुज्ञाप्य राजानं पुत्रशोकसमाहतम् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
समनुज्ञाप्य राजानमहल्यां प्रति जग्मिवान् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
समनुज्ञासिषं कन्यां ज्येष्ठामम्वां नराधिप ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच
समनुप्राप्तकृच्छ्रोऽहं संमोहं परमं गतः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
समनुष्योरगवतां कर्ता चैव स भूतकृत् ||
५५ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
समन्ततः परिक्षिप्ता माता मेऽभूद्दवाग्निना ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
समन्ततः प्रणदितान्ददर्श सुमनोहरान् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
समन्ततो द्विजश्रेष्ठा वल्गु कूजन्ति तत्र वै |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
समन्ततो विनिय़तो वहत्यस्खलितो हि यः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
समन्ततो व्यदृश्यन्त पतिता धरणीतले ||
१३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
समन्ततोऽग्नीनुपदीपय़ित्वा; तेपे तपो धर्मभृतां वरिष्ठः ||
१७ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
समन्ततोऽवकृष्यन्त कामाच्चान्याः प्रवव्रजुः ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
समन्तपञ्चकं क्षिप्रमितो याम विशां पते |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
समन्तपञ्चकं नाम पुण्यं द्विजनिषेवितम् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
समन्तपञ्चकं यावत्तावत्ते द्विजसत्तमाः |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
समन्तपञ्चकं वीरः प्राय़ादभिमुखः प्रभुः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
समन्तपञ्चकद्वारात्ततो निष्क्रम्य माधवः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
समन्तपञ्चकमिति पुण्यं तत्परिकीर्तितम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २
ऋषय़ ऊचुः
समन्तपञ्चकमिति यदुक्तं सूतनन्दन |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
समन्तपञ्चकाख्यं च श्रोतुमर्हथ सत्तमाः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
समन्तपञ्चकादस्माद्वहिर्वानरकेतन ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
समन्तपञ्चकाद्वाह्यं विशोका भव मा रुदः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
समन्तपञ्चकाद्वाह्यं शिरस्तद्व्यहरत्ततः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
समन्तपञ्चकाद्वाह्यं शिविराणि सहस्रशः |
६ क
वन पर्व
अध्याय ११७
अकृतव्रण उवाच
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
समन्तपञ्चके पुण्ये त्रिषु लोकेषु विश्रुते |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
समन्तपञ्चके या वै त्रिषु लोकेषु विश्रुता ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनय़ोः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
समन्तसंशय़ा चेय़मस्मानापदुपस्थिता ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
समन्ताच्छङ्खनिनदं पाण्डुसेनाकरोत्तदा |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
समन्तात्कलधौताग्रा उपासङ्गे हिरण्मय़े ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
समन्तात्कीर्यमाणस्तु वाणसङ्घैर्महात्मभिः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
समन्तात्क्रोशमात्रं च कारिता विषमा च भूः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
यतिरु उवाच
समन्तात्परिमुक्तस्य न भय़ं विद्यते क्वचित् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
समन्तात्पर्यधावन्त महेन्द्रप्रमुखान्सुरान् ||
४ ख