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उद्योग पर्व
अध्याय १०
इन्द्र उवाच
समर्थो ह्यभवं पूर्वमसमर्थोऽस्मि साम्प्रतम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
समर्थो ह्यहमेकाकी कर्म कर्तुमिदं मुने ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
समर्थोऽसि महावाहो सर्वे ते वशगा वय़म् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
समर्थोऽसि महीं जेतुं भ्रातरस्ते वशे स्थिताः |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
समर्थोऽय़ं भवतः सर्वाः पापकृत्याः शमय़ितुमन्तरेण महादेवकृत्याम् |
१५ घ
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
समर्थौ पर्वतस्यापि शैशिरस्य निपातने ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
समर्पय़ित्वा विननाद चार्दय़ं; स्ततोऽस्य वाहू विचकर्त पाण्डवः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
समवच्छाद्य गाङ्गेय़ं प्रज्वाल्य च हुताशनम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
समवर्णासु जातानां विशेषोऽस्त्यपरो नृप |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
समवर्तत सङ्ग्रामे पुत्रेण निकृतस्तव ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
समवस्थापितं भूय़ो युष्मासु कुलतन्तुषु ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
समवाप च तं यज्ञं यथोक्तं व्रह्मवादिभिः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
समवाप्य श्रिय़ं देवो हत्वारींश्च सहस्रशः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
समवाय़ं तु तं रौद्रं दृष्ट्वा शक्रो व्यचिन्तय़त् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
समवाय़ः स राजेन्द्र सुमहाद्भुतदर्शनः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
समवाय़े ततो राज्ञां कन्यां भर्तृस्वय़ंवराम् |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
समवेक्षस्व मघवन्वुद्धिं विन्दस्व नैष्ठिकीम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
समवेक्ष्य तथा राज्ञा प्रणेय़ाः सततं कराः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४१
व्यास उवाच
समवेक्ष्य शनैः सम्यग्लभते शममुत्तमम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
समवेक्ष्य शनैश्चैव लभते शममुत्तमम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
समवेक्ष्येह धर्मार्थौ सम्भारान्योऽधिगच्छति |
६४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
समवेतांश्च तान्सर्वान्पौरजानपदानथ ||
११ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
समवेतांस्तु तान्सर्वान्भारद्वाजोऽपि वीर्यवान् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
समवेताः पृथिव्यां हि राजानो राजसत्तम |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
समवेतान्कुरून्यावज्जिगीषूनवजित्य वै |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
समवेतान्हि कः पार्थान्प्रतिय़ुध्येत भारत |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
समवेतास्त्रय़ः शूरा भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
समवेतेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत |
१ क
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
समवेतेषु सूतेषु तानुवाचोपकीचकः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
समवेतौ महात्मानौ त्वदर्थे समलङ्कृतौ ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
समवेत्य च देवानां गणाः पार्थमपूजय़न् ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
समवेषं न कुर्वीत नात्युच्चैः संनिधौ हसेत् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
समवैक्षत तं विप्रो ज्ञानदीर्घेण चक्षुषा |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
समशोभत तेजस्वी भूय़ो भीमात्सुय़ोधनः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
समश्च त्वं संमतः कौरवाणां; पथ्यं चैषां मम चैव व्रवीहि ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
समश्च नाभिशङ्क्यश्च यथा माता यथा पिता ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
समश्च पन्था निर्दुःखो व्यपेतकुशकण्टकः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
समसज्जत पाञ्चाल्यस्त्रिभिरेतैर्महारथैः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
समसज्जन्त चत्वारो वाताः पर्वतय़ोरिव ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
समसज्जन्त राजेन्द्र समरे भृशवेदनाः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
समसर्पत्ततो भूतं किञ्चिदेव विशां पते ||
७१ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
समस्तं पार्थिवं क्षत्रं त्वत्प्रसादाद्वशानुगम् |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
समस्तं पार्थिवं क्षत्रमभिगम्येदमव्रवीत् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
समस्तत्याग इत्येव शम इत्येव निष्ठितः |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
समस्तमिह तच्छ्रुत्वा सम्यगेवावधार्यताम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
समस्ताः स्वेषु राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेमहि ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
समस्ताक्षौहिणीपाला यज्वानो भूरिदक्षिणाः |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
समस्तानां वधे राजन्मतिं चक्रे महामनाः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
समस्तानीन्द्रिय़ाणीव शरीरस्य विचेष्टने ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २५६
भीमसेन उवाच
समस्तान्सरथान्पञ्च जय़ेय़ं युधि पाण्डवान् |
२७ क