शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
समानीय़ यथापाठं विप्रेभ्यो दत्तदक्षिणः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
समानीय़ वहून्विप्रान्भीष्मं विदुरमेव च ||
२५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
समानीय़ाव्रवीद्भ्रातॄन्किं करिष्याम इत्युत ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
समानेतुं नलं मातरय़ोध्यां नगरीमितः ||
१६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
समानेष्यामि सगणं वशमद्य न संशय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
भीष्म उवाच
समानेष्वेव दोषेषु वृत्त्यर्थमुपघातय़ेत् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
समानय़द्दर्शनीय़ं तत्तद्यत्नात्ततस्ततः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
समानय़न्तु पुरुषा यथाय़ोगं यथाक्रमम् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
समानय़ानावजितौ नरोत्तमौ; शरोत्तमैर्द्रौणिरविध्यदन्तिकात् ||
६१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६
विराट उवाच
समानय़ानो भवितासि मे सखा; प्रभूतवस्त्रो वहुपानभोजनः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
समानय़ानय़ा चेह सहवासमहं कथम् |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
समानय़ामास तदा विराटस्य धनं महत् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
समानय़ामास सुतां च कृष्णा; माप्लाव्य रत्नैर्वहुभिर्विभूष्य ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
समानय़िष्ये शक्रेण नचिराद्भवतीमहम् ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
समापिपय़िषुः सत्रं तमत्रिः समुपागमत् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
समापेततुरानद्य शृङ्गिणौ वृषभाविव |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
समापेतुः परीप्सन्तो धनञ्जय़शरार्दितम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
समापेतुर्नृपतय़ः कन्यार्थे नृपसत्तम ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
समापेतुर्महावीर्या भीमप्रभृतय़ो रथाः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
समापेतुस्तथा वाणा भीमसेनरथं प्रति ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
समाप्तं भरतश्रेष्ठ मातापित्रोश्च दर्शनम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
समाप्तकर्मा सहितः सुहृद्भि; र्जित्वा सपत्नान्प्रतिलभ्य राज्यम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
समाप्तजप्यस्तूत्थाय़ शिरसा पादय़ोस्तथा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
समाप्तदीक्षश्च्यवनस्ततोऽगच्छत्स्वमाश्रमम् |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
समाप्तमद्य वै कर्म सर्वं कृष्ण भविष्यति |
२३ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
समाप्तमाय़ुरस्याद्य यशश्चापि सुमध्यमे ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
समाप्तवचने तस्मिन्नर्थशास्त्रविशारदः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
समाप्तविद्यं तु गुरोः सुतं नृपः; समाप्तकर्माणमुपेत्य ते सुतः |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
समाप्तविद्यान्धनुषि श्रेष्ठान्यान्मन्यसे युधि ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
समाप्तविद्येन यथाभिभूतौ; हतौ स्विदेतौ किमु मेनिरेऽन्ये ||
६६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
धृतराष्ट्र उवाच
समाप्तविद्यो वलवान्युक्तो वीरश्च पाण्डवः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
समाप्तव्रतमुत्तीर्णं विद्धि मां त्वं नृपात्मज ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
समाप्तिं नागमद्विद्या नापि वेदा विशां पते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
समाप्ते निय़मे तस्मिन्नथ विप्रस्य धीमतः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
समाप्ते निय़मे तस्मिन्महर्षिः पुत्रमव्रवीत् ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
समाप्तय़ज्ञः सगरो देवैः सर्वैः सभाजितः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
समाप्तय़ज्ञो राजापि प्रजाः पालितवान्वसुः |
५५ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
समाप्य च हरिश्चन्द्रो महाय़ज्ञं प्रतापवान् |
६१ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
समाप्यतामिदं कर्म पन्नगाः सन्त्वनामय़ाः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
३५
सूत उवाच
समाप्यैव च तत्कर्म पितामहमुपागमन् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
समापय़ामास च तं राजसूय़ं महाक्रतुम् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
समाभाष्य प्रहर्तव्यं न विश्वस्ते न विह्वले ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
समाभाष्यैनमपरं प्रगृह्य रुचिरं धनुः |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
समामवृक्षां निर्गुल्मामुदक्प्रवणसंस्थिताम् ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
समाम्नाय़ोऽसमाम्नाय़स्तीर्थदेवो महारथः ||
११९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
समारम्भान्वुभूषेत हतस्वस्तिरकिञ्चनः |
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
समारम्भो हि शक्योऽय़ं नान्यथा कुरुनन्दन |
६७ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
समाराधय़त क्षिप्रं च्यवनं सा शुभानना ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
समारुह्य नरः श्राद्धः स्तनकुण्डेषु संविशेत् ||
१३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
समारुह्य महावाहुर्ययौ येन तवात्मजः ||
३ ख