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द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
स चापि तान्प्रवरः सात्वतानां; न्यवारय़द्वाणजालेन वीरः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि तान्प्रेक्ष्य किरीटमाली; ननन्द राजानमभिप्रशंसन् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि तेभ्यो विस्तरतः शशंस; यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽऽम्विकेय़ः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
स चापि दृष्ट्वा समुदीर्यमाण; मस्त्रं युगान्ताग्निसमप्रभावम् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
स चापि देवावृधसूनुरर्दितः; पपात नुन्नः सहदेवसूनुना ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
स चापि द्विरदश्रेष्ठः सदाप्रतिगजो युधि |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
दुःषन्त उवाच
स चापि निरनुक्रोशः क्षत्रय़ोनिः पिता तव |
७४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
स चापि निहतो वृद्धो धृष्टद्युम्नेन सत्वरम् ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि परमेष्वासः कृपः शारद्वतस्तथा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
स चापि पापप्रकृतिर्दैतेय़ापसदो नृप |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
स चापि पार्श्वे सुष्वाप विश्वस्तो वकराट्तदा |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
स चापि पालय़ामास यथावत्तच्च वेत्थ ह ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
स चापि पुण्डरीकाक्षं तथैवाभिसमैक्षत ||
७१ ख
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि प्रतिजग्राह धर्मेण विदुरं ततः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि भीष्मस्य हय़ान्निहत्य; विव्याध पार्श्वे दशभिः पृषत्कैः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि भूमौ परिवर्तमानो; वधं सुतानां मम काङ्क्षमाणः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
स चापि भृगुशार्दूलस्तं वेदं धारय़िष्यति ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स चापि मम सखा इन्द्रः ||
१७५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
स चापि मुनिशार्दूलः प्रेषय़ामास ते पितुः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि राजवचनादाचार्यो गौतमः कृपः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २६
मार्कण्डेय़ उवाच
स चापि राजा सह लक्ष्मणेन; वने निवासं पितुरेव शासनात् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
स चापि रूपेण घटोत्कचस्य; श्रीमत्तमो व्याकुलदीपितास्यः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
स चापि वरय़ामास पितुरुत्थानमात्मनः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि ववृधे वालः शुक्लपक्षे यथा शशी ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि वीरः कृतशस्त्रनिश्रमः; परेण साम्नाभ्यवदत्सुय़ोधनम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
स चापि व्राह्मणो भूत्वा दुर्वासा नाम वीर्यवान् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २६
मार्कण्डेय़ उवाच
स चापि शक्रस्य समप्रभावो; महानुभावः समरेष्वजेय़ः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
स चापि शरवर्षं तच्छरवर्षेण वासविः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
स चापि सगरो राजा जगाम स्वं निवेशनम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि सम्यक्प्रणिधाय़ शिक्षा; मस्त्राणि चैषां गुरुवत्प्रदाय़ |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
स चापि सृष्टः पित्रा ते भीष्मस्यान्तकरः किल |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
स चाप्यग्न्याहितो विप्रः क्रिय़ा यस्य न हीय़ते |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
स चाप्यशक्यः सङ्ग्रामे जेतुं सर्वैः सुरासुरैः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ४
तमृषय़ ऊचुः
स चाप्यस्मिन्मखे सौते विद्वान्कुलपतिर्द्विजः |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
स चाप्यस्मिन्वने तप्त्वा तपो दिवमवाप्तवान् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
स चाप्यासीद्दुराधर्षो नरकः शत्रुतापनः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
नारद उवाच
स चाप्युपगतो युद्धं भीमेन सह साम्प्रतम् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
स चाप्यृषिर्भृगुकुलकीर्तिवर्धन; स्तपोधनो वनमभिराममृद्धिमत् |
६९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
स चाप्येतद्विजानाति वासुदेवार्जुनौ तथा |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय १९०
द्रुपद उवाच
स चाप्येवं वरमित्यव्रवीत्तां; देवो हि वेद परमं यदत्र ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५३
भीष्म उवाच
स चामन्त्र्योरगश्रेष्ठं व्राह्मणः कृतनिश्चय़ः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
स चारित्रं विशोध्याथ सर्वप्रकृतिसंनिधौ |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
स चालोक्य ध्वजिनीं पाण्डवानां; धनञ्जय़ं त्वरय़ा पर्यपृच्छत् ||
७४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
स चाविशद्दिवं राजन्स्वरः शैक्षस्त्रितस्य वै |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
स चाश्रमेऽवसत्सिंहस्तस्मिन्नेव वने सुखी ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
स चाश्विरूपसदृशो देवसत्त्वपराक्रमः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
स चास्माकमुपाध्याय़ः सहास्माभिर्विशां पते |
१०० क
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
स चास्य दशभी राज्यैः प्रतिजग्राह शासनम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
स चास्य प्रतिजग्राह शासनं प्रीतिपूर्वकम् |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स चास्य प्रीतिमानभूत् ||
७६ ख