शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
समितिं व्राह्मणैर्गच्छेदिति वै व्राह्मणी श्रुतिः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
समितिर्धर्मराजस्य सा पार्थिवसमाकुला |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
समितौ गर्जते कर्णस्तमद्य जहि भारत ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३८
लोमश उवाच
समित्कलापमादाय़ प्रविवेश स्वमाश्रमम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
समित्कुशार्थं रामस्य निर्गतस्य महात्मनः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
समित्तृणकुशा राजन्सशतघ्नीकलाङ्गला ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
समित्पाणिरुपागच्छदाश्रमं भृगुनन्दनः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
समित्रवन्धुः समरे प्राणांस्त्यक्ष्यति दुर्मतिः ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
समिद्धं पावकं वापि घृतमेदोवसाहुतम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
समिद्धं स पवित्राभिरग्निमाहुतिभिस्तथा |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
समिद्धः शिशिरापाय़े दहन्कक्षमिवानलः ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
यवक्रीरु उवाच
समिद्धेऽग्नावुपकृत्याङ्गमङ्गं; होष्यामि वा मघवंस्तन्निवोध |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
समिद्धोऽग्निः शिरस्तस्य वाहू सूर्यनिभौ तथा |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
समिद्धोऽग्निर्यथा वीर महाज्वालो द्रुमान्दहेत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
समिधामुपय़ोगान्ते सन्नेवाग्निर्न दृश्यते |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
समिय़ाय़ च धर्मात्मा धृतराष्ट्रेण पाण्डवः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
समिय़ाय़ महाप्राज्ञः सभार्यो भ्रातृमध्यगः ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
समिय़ाय़ यथान्याय़ं द्रौणिना च विभुः सह ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
समीकः सत्यवांश्चैव प्रचेताः सत्यसङ्गरः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
समीकरिष्ये तत्पापं यत्पुरा कृतवानसि ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्षते तु योऽर्थं वै कामं स्वर्गं च भारत |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्षध्वं महारण्ये देशं वहुमृगद्विजम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्षमाणः स तु तां वय़ःस्थां तनुवाससम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्षस्व पुनर्वुद्ध्या हर्षं त्यक्त्वा द्विजोत्तम |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
समीक्षा यादृशी ह्यस्य पाण्डवान्प्रति भारत |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
समीक्षेथा धर्मवतीमवेक्षां; गुरोः सकाशात्प्राप्य विद्यां सविद्यः ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
समीक्ष्य कर्णः पार्थानां धृष्टद्युम्नाभिरक्षितम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
समीक्ष्य कृष्णा वरय़ेत्सङ्गत्यान्यतमं वरम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
समीक्ष्य च वहून्दोषान्संवासाद्विद्विषाणय़ोः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
समीक्ष्य च समारम्भो विद्धि मूलं भवस्य तत् ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्ष्य तान्द्वैतवने निविष्टा; न्निवासिनस्तत्र ततोऽभिजग्मुः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्ष्य निपुणं वुद्ध्या ऋषिः प्रोवाच पाण्डवम् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्ष्य पितरं स्वस्थं ववन्दे वभ्रुवाहनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
समीक्ष्य पूजय़न्राजा धर्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
समीक्ष्य मोहं त्यज चाद्य सर्वं; ज्ञानस्य तत्त्वार्थमिदं विदित्वा ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्ष्य यक्षगन्धर्वा निर्विकारा व्यवस्थिताः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
समीक्ष्य राजन्नरवीरमध्ये; शिनिप्रवीरोऽनुय़यौ रथेन ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
समीक्ष्य राजा दाशेय़ीं कामय़ामास शन्तनुः ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
समीक्ष्य लोके वहुधा प्रधाविता; त्रिवर्गदृष्टिः पृथिवीमुपाश्नुते ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
समीक्ष्य वलभिद्देव इदं वचनमव्रवीत् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
समीक्ष्य सङ्ख्येऽतिवलान्नराधिपै; र्नराश्वमातङ्गरथाञ्शरैर्हतान् |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
द्रौपद्यु उवाच
समीक्ष्य सर्वे मम चापि वाक्यं; विव्रूत मे प्रश्नमिमं यथावत् ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
समीक्ष्य सेनाग्रगतं दुरासदं; प्रविव्यथुः पङ्कगता इवोष्ट्राः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
समीक्ष्यैतदहं सर्वं व्यवसाय़ं करोम्यतः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५२
ऋषय़ ऊचुः
समीजिरे यत्र पुरा दिवौकसो; वरेण सत्रेण महावरप्रदाः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
समीननागनक्रं च खमिवारोप्यते जलम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६१
तपत्यु उवाच
समीपं नोपगच्छामि न स्वतन्त्रा हि योषितः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
समीपं प्रेषय़ामास प्रेतराजस्य भारत ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
समीपं सैनिकास्ते तु शीघ्रमीय़ुर्युय़ुत्सवः |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
समीपतो महाराज सोपातिष्ठत भामिनी ||
८ ख