अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
मनुरु उवाच
समीपमाजगामाशु शुक्रो भृगुकुलोद्वहः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
समीपमापगेय़स्य प्रय़ास्यति जनार्दनः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
समीपमाय़ाति च मे गतव्यथो; यथा गजस्तामरसीं मदोत्कटः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
समीपमुपसम्प्राप्तः कार्त्तिकेय़स्य वासवः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
समीपमृतुपर्णस्य स हि वेदाक्षनैपुणम् |
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
समीपमेत्य च तदा सर्व एव महौजसः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
समीपवासेन विलोभितास्ते; ज्ञास्यन्ति नास्मानपकृष्टदेशान् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
समीपस्थं भीममिदं शशास; प्रदीय़तां पाद्यमर्घ्यं तथास्मै ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
समीपस्थं मद्रराजं समारोपय़दग्रतः ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
समीपस्थं हृषीकेशमिदं वचनमव्रवीत् ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
समीपस्थास्तदा गावो धृतराष्ट्रे न्यवेदय़त् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
समीपे च महावाहुमाचष्ट च मम प्रभो |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
समीपे जग्मतुः कञ्चिदुद्देशं सुमनोहरम् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
समीपे ते न वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
समीपे नगरस्यास्य वको वसति राक्षसः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
समीपे पार्थिवेन्द्रस्य सम्यक्पारिक्षितस्य च ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
समीपे सरसः सोऽस्य तपस्तेपे महाद्युतिः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
समीपे सह्यमलय़ौ दर्दुरं च महागिरिम् ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
समीपे सैन्धवं दृष्ट्वा श्येनय़ोरामिषं यथा ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
समीपोपस्थितं राजा सञ्जय़ं वाक्यमव्रवीत् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
समीप्सन्तः कालय़ोगं त्यजन्ति; सद्यः शुचं त्वर्थविदस्त्यजन्ति |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
समीरणेनापि समो वलेन; समीरणस्यैव सुतो वलीय़ान् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
समीरणय़ुतः कृत्स्नां दहेत्क्षिप्रं महीमपि ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
समीरय़ेत सङ्क्रुद्धो यथा जानाम्यहं तथा ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
समीय़तुः सुसङ्क्रुद्धावङ्गारकवुधाविव ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
समीय़तुर्महासङ्ख्ये मय़शक्रौ यथा पुरा ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
समीय़तुस्तदा तूर्णं परस्परवधैषिणौ ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
धृतराष्ट्र उवाच
समीय़तू रणे शूरौ तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
समीय़ुः पाण्डुपुत्रेण वहवो युद्धदुर्मदाः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
समीय़ुस्तत्र सहिता द्रष्टुं तद्वैशसं महत् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
समुक्षञ्शरवर्षेण रथस्थोऽन्तकसंनिभः ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
समुक्षत महाराज शैलं नील इवाम्वुदः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
समुच्चरन्त्यतिवादा हि वक्त्रा; द्यैराहतः शोचति रात्र्यहानि |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
समुच्चितास्तव सुतैः कृष्णार्जुनजिघांसवः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
समुच्छेत्स्यति पाञ्चालानिति मन्ये परन्तप ||
५० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
समुच्छेदं च कृत्स्नं नः कृत्वा तात जनार्दनः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
समुच्छेदं हि नः कृत्स्नं वासुदेवश्चिकीर्षति ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
समुच्छ्रितं दान्तशलाकमस्य; सुपाण्डुरं छत्रमतीव भाति |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
समुच्छ्रितपताकानां गजानां परमद्विपैः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
समुच्छ्रितमहाकाय़ो द्वितीय़ इव पर्वतः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
समुच्छ्रितमहाभीमनदद्वानरकेतुना |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
समुच्छ्रितैर्ध्वजैश्चित्रैः शस्त्रैश्च विमलैः शितैः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
समुच्छ्रय़ं देवय़ानीं गतां सक्तां च वाससि |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
समुच्छ्रय़ान्पर्वतसंनिरोधा; न्गोष्ठान्गिरीणां गिरिसेतुमालाः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
समुच्छ्रय़े यो यतते स राजन्परमो नय़ी ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
समुज्जिहीर्षुर्वेगेन भिन्नां नावमिवार्णवे ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
समुत्कृष्टे दुन्दुभिशङ्खशव्दे; गदापाणिं भीमसेनं स्मरन्ति ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
समुत्क्षिप्य गदाश्चान्ये पर्यपृच्छन्त पाण्डवम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
समुत्क्षिप्य च तां हृष्टो ननाद वलवद्वली |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
समुत्क्षिप्य च राधेय़ः सन्धाय़ च महावलः |
२१ ख