chevron_left  समुद्धूतार्णवाकारमुद्धूतरथकुञ्जरम्arrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
समुद्धूतार्णवाकारमुद्धूतरथकुञ्जरम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्धूतो घनापाय़े वेलामिव महोदधिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
समुद्धृतमिदं व्रह्मन्कथामृतमनुत्तमम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
समुद्धृताः फल्गुनेन निमग्नाः शोकसागरे ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
समुद्भ्रान्तमहावर्ता मीनग्राहसमाकुला ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
समुद्यच्छन्महावाहुर्जिघांसुस्तनय़ं तव ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
समुद्यतकराभ्यां तौ द्विपाभ्यां कृतिनावुभौ |
३० क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
समुद्यतगिरिं राजन्व्यद्रवन्त दिवौकसः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय ९९
लोमश उवाच
समुद्यतप्रहरणैः सशृङ्गैरिव पर्वतैः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
समुद्यतां तां यमदण्डकल्पां; दृष्ट्वा गदां ते कुरवः समन्तात् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
समुद्यते पार्थिवेन्द्रे पार्षते शत्रुसूदने ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
समुद्यतेषु शस्त्रेषु सम्प्राप्ते च युधिष्ठिरे |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
समुद्यतोऽय़ं भारो मे सुमहान्सागरोपमः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६९
धृतराष्ट्र उवाच
समुद्यन्तं सात्वतमेकवीरं; प्रणेतारमृषभं यादवानाम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
समुद्यम्य गदां गुर्वीं यमदण्डोपमां रणे ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
समुद्यम्य गदां घोरां प्रत्यविध्यदरिन्दमः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
समुद्यम्य च चिक्षेप सत्यसेनस्य संय़ुगे ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २५६
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्यम्य च तं रोषान्निष्पिपेष महीतले |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
समुद्यम्य महावाहुः शल्यमभ्यद्रवद्रणे ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
समुद्यम्यानय़ामास नातिकृच्छ्रादिव प्रभुः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
समुद्योज्य ततः पश्चाद्राजाप्यक्षौहिणीवृतः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
समुद्र इव गाम्भीर्ये क्रोधे सर्पविषोपमः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्र इव गाम्भीर्ये सहिष्णुत्वे धरासमः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
समुद्र इव सिन्धूनां ज्योतिषामिव भास्करः |
२ क
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
समुद्रं च समासाद्य गङ्गय़ा सहितो नृपः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
समुद्रं च समासाद्य वहुय़ोजनविस्तृतम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रं चाविशन्त्यन्ये नराः कामेन संय़ुताः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
समुद्रं ते समाश्रित्य वारुणं निधिमम्भसाम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
समुद्रं नय़ मामाशु प्रसीद भगवन्निति ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
समुद्रं प्रतरेद्दोर्भ्यां तत्र किं नाम पौरुषम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७५
शुक्र उवाच
समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुराः |
८ क
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रं यास्यति श्रीमांस्त्यक्त्वा देहं हलाय़ुधः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
समुद्रं स समासाद्य निस्तोय़ं भीमदर्शनम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
समुद्रं स समासाद्य वारुणिर्भगवानृषिः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ७५
वृषपर्वो उवाच
समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामो नान्यदस्ति पराय़णम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
समुद्रकल्पं तु वलं धार्तराष्ट्रस्य माधव |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
गौतम उवाच
समुद्रकल्पः पुरुषो न कदाचन पूर्यते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
समुद्रकल्पः स नरो न कदाचन पूर्यते ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१
सूत उवाच
समुद्रकुक्षावेकान्ते तत्र मां विनते वह ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २४
विनतो उवाच
समुद्रकुक्षावेकान्ते निषादालय़मुत्तमम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
समुद्रकुक्षिप्रतिमं सर्वतोऽतिरथैः स्थितैः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
समुद्रकुक्षिमाश्रित्य दुर्गे प्रतिवसन्त्युत ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २४
सूत उवाच
समुद्रकुक्षौ च विशोषय़न्पय़ः; समीपगान्भूमिधरान्विचालय़न् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
समुद्रकुक्षौ विक्रम्य पातय़ामास माधवः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
समुद्रगमनाकाङ्क्षी द्रव्यार्थमिति भारत ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
समुद्रगा महावेगा यमुना यत्र पाण्डव ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रगां पुण्यतमां प्रशस्तां; जगाम पारिक्षित पाण्डुपुत्रः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
समुद्रतरणं दोर्भ्यां कण्ठे वद्ध्वा यथा शिलाम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
समुद्रतीरं गत्वा सा त्वाजहार फलद्वय़म् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
समुद्रतीरेण शनैर्मणलूरं जगाम ह ||
१३ ख