सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तैरेव सहितः सर्वैर्गिरिव्रजमुपाद्रवत् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तैरेव सहितो राजन्कर्णमभ्यद्रवद्वली ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
तैरेव सहितो राज्ञो वेश्म तूर्णमुपाद्रवत् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
तैरेव सार्धं तु ततः स देवो; जगाम नाराय़णमप्रमेय़म् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
तैरेवमुक्तो भगवान्मनुः स्वाय़म्भुवोऽव्रवीत् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
तैरेवाधर्मश्चरितो धर्ममोहा; त्तूर्णं जह्यात्सुकृतं दुष्कृतं च ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
तैरेवाहं सम्प्रवृद्धा भवामि; आप्याय़िता रूपवती च विप्र ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
तैरेवाय़ं चेन्द्रिय़ैर्वर्धमानै; र्ग्लाय़द्भिर्वा वर्तते कर्मरूपः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तैरेवोपार्जितां भूमिं भोक्ष्यसे च परन्तप |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तैर्तर्पय़ित्वा प्रथमं व्राह्मणान्मधुसूदनः |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
तैर्दत्तानप्रदाय़ैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तैर्मन्यते कलहं सम्प्रय़ुज्य; स धार्तराष्ट्रः पश्यत मोहमस्य ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
तैर्मोक्षितोऽहं दुर्वुद्धिर्दत्तं तैर्जीवितं च मे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तैर्यजस्व महाराज शक्रो देवपतिर्यथा ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तैर्यतद्भिरिय़ं सत्या श्रुता सत्यवतस्तव |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तैर्यथा पाण्डवैः सर्वैरेकैकेन कृतं पुरा ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
तैर्लक्षणैरुपेतौ हि व्यक्तरूपधरौ युवाम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
तैर्ललाटार्पितैर्वाणैर्युय़ुधानस्त्वजिह्मगैः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
तैर्लव्धा द्रौपदी भार्या द्रुपदश्च सुतैः सह |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
तैर्वध्यमानं तत्सैन्यं सपत्त्यश्वरथद्विपम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
तैर्वाहं निहतः सङ्ख्ये गमिष्ये यमसादनम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
युधिष्ठिर उवाच
तैर्विग्रहो यथा न स्यात्तथा कार्यं त्वय़ानघ ||
२३ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तैर्विना नोत्सहे वस्तुमिह दैत्यनिवर्हण |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
तैर्विप्रकारं च निशम्य राज्ञः; सुहृज्जनास्तान्परिवारय़ेय़ुः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
तैर्विमुक्ता महाप्रासा जाम्वूनदविभूषणाः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तैर्विमुक्तैः शरशतैश्छादितं गगनं तदा |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
तैर्विमुक्तो रथो रेजे वाय़्वीरित इवाम्वुदः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
तैर्विसृष्टं महावाहुं कृत्या सैवानय़त्पुनः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु क्रुद्धैः शस्त्राणि संय़ुगे |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु वाणजालान्यनेकशः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
तैर्विसृष्टैर्महत्सैन्यं नानाम्लेच्छगणैस्तदा |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तैर्विह्वलद्भिश्च गतासुभिश्च; प्रध्वस्तय़न्त्राय़ुधवर्मय़ोधैः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
तैर्वीतहव्यैरागत्य युधि सर्वैर्विनिर्जितः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
तैर्वृतः कुशिको राजा श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
तैर्वृतः पुरुषव्याघ्रो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
तैर्वृतः सर्वतः शूरैः पाञ्चाल्यापसदस्ततः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तैर्हतैर्हन्यमानैश्च पतद्भिः पतितैरपि |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
तैर्हि मे सन्धितो वाणः काके निपतितः प्रभो ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
तैर्हि सद्भिः कृतः पन्थाश्चेतय़ानो न मुह्यते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
तैर्हि सम्प्रीय़माणस्त्वं सर्वान्कामानवाप्स्यसि ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
तैरय़ं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
तैरय़ुद्धं साधु मन्ये कुरवस्तन्निवोधत |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
तैलं दिव्यमुपादाय़ स्नानशाटीमुपानय़त् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
तैलं मधु घृतं सस्यमौषधानि च सर्वशः ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
तैलधौता व्यराजन्त निर्मुक्तभुजगोपमाः ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तैलधौतांश्च नाराचान्निर्मुक्तानिव पन्नगान् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तैलधौतैः प्रकाशद्भिस्तदशोभत वै वलम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
तैलपात्रं यथा पूर्णं कराभ्यां गृह्य पूरुषः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तैलाभिषिक्तो विकचो मज्जन्पङ्के दशाननः |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
तैलाभ्यक्तस्य गमनं भोजनं च गृहे मम |
५ क