कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
वैवस्वताद्दण्डहस्ताद्वरुणाद्वापि पाशिनः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
वैवस्वताय़ मनवे गौतमः प्राह माधव ||
१६६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
वैवस्वती संय़मनी जनानां; यत्रानृतं नोच्यते यत्र सत्यम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
वैवस्वतीं प्राप्य सभामपश्यं; सहस्रशो योजनहैमभौमाम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
वैवस्वतेऽन्तरे विप्राः प्राप्ते त्रेताय़ुगे ततः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
वैवस्वतो धर्मराजो विमानेनावभासय़न् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्रह्मो उवाच
वैवस्वतो व्यापृतः सत्रहेतो; स्तेन त्विमे न म्रिय़न्ते मनुष्याः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
वैवस्वतोऽर्घ्यादिभिरर्हणैश्च; भवत्कृते पूजय़ामास मां सः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
वैवाहिकानां कन्यानां प्रेष्याणां च युधिष्ठिर |
९६ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
वैवाहिकेन पाञ्चालाः सख्येनान्धकवृष्णय़ः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
वैशम्पाय़नविप्रर्षिः किं दैवेन निवारितः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
वैशम्पाय़नविप्राद्यैस्तैश्चापि कथितं पुरा ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
वैशसं च प्रतीक्षध्वं रक्षध्वं चापि गोधनम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
भीम उवाच
वैशसं वास्तु यद्वान्यन्न त्वा पृच्छामि वानर |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
वैशसं समरे वृत्तं यत्तन्मे शृणु सर्वशः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
वैशसं सुमहत्कृत्वा ज्ञातीनां लोमहर्षणम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
वैशालाक्षमिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
वैश्यं हत्वा तु वर्षे द्वे ऋषभैकशताश्च गाः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
वैश्यः कश्चिदृषिं तात काश्यपं संशितव्रतम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
वैश्यः किल समुद्रान्ते प्रभूतधनधान्यवान् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
वैश्यः पुरुषकारेण शूद्रः शुश्रूषय़ा श्रिय़म् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
वैश्यः शूद्रश्च वाह्लीकस्ततो भवति नापितः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भरद्वाज उवाच
वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद्व्रूहि वदतां वर ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
वैश्यः स्वकर्मनिरतः प्रदानाल्लभते महत् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
वैश्यः स्वजातिं विन्देत तास्वपत्यं समं भवेत् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
वैश्यकर्म च यो विप्रो लोभमोहव्यपाश्रय़ः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
वैश्यताय़ां चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
वैश्यत्वं भवति व्रह्मन्क्षत्रिय़त्वं तथैव च ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
वैश्यशूद्रौ तु यौ मोहादुपवासं प्रकुर्वते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
वैश्यस्तु धनधान्येन त्रीन्वर्णान्विभृय़ादिमान् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
वैश्यस्य चैव वक्तव्यं प्रीय़न्तां देवता इति ||
३८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
वैश्यस्य वर्तमानस्य वैश्याय़ां भरतर्षभ |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
वैश्यस्यापीह यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
वैश्यस्यैते यदि गुणास्तस्य पञ्चाशतं भवेत् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
वैश्यस्यैव तु साहाय़्यं कुर्वाणः क्षत्रिय़ो युधि |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवज्रा यवीय़सः ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
वैश्यांश्चाप्यूरुतो राजञ्शूद्रान्पद्भ्यां तथैव च |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
वैश्याः कृषिं यथान्याय़ं कारय़न्ति नराधिप |
१०० क
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्व्रह्ममहं तदा ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
शल्य उवाच
वैश्याः शूद्रास्तथा कर्ण स्त्रिय़ः साध्व्यश्च सुव्रताः ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
वैश्यानां पीतको वर्णः शूद्राणामसितस्तथा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
वैश्यानां यज्ञसंवृत्तिरातिथेय़समन्विता ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
वैश्यानिव महाराज विवशान्स्ववशानपि ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
वैश्यान्वा गुणसम्पन्नानुत वा शूद्रय़ोनिजान् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
वैश्यापुत्रः कुशली तात कच्चि; न्महाप्राज्ञो राजपुत्रो युय़ुत्सुः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
वैश्यापुत्रः सहितो गौतमेन; धौम्यो विप्राश्चान्वय़ुर्वाष्पकण्ठाः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
वैश्यापुत्रस्तदाचष्ट पार्थानां हितकाम्यया |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
वैश्यापुत्रस्तु भागांस्त्रीन्शूद्रापुत्रस्तथाष्टमम् |
५० क