शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
तत्राश्रमपदं पुण्यं ददर्श पितुरुत्तमम् |
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
तत्राश्रमपदं पुण्यं नानावृक्षगणाय़ुतम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तत्राश्रमपदे श्रेष्ठे सर्वभूतमनोरमे |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः |
१२१ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
तत्राश्रौषं नरव्याघ्र शाल्वं नगरमन्तिकात् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
तत्राश्रौषं महाराज पुत्राणां तव विभ्रमम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
तत्राश्रौषमहं चैतत्कर्म भीमस्य भारत |
७४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
तत्राश्रौषमहं सर्वमेतत्पुरुषसत्तम |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
तत्राश्वमेधः सुमहान्महेन्द्रस्य महात्मनः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
तत्राश्वसीत सत्कृत्वा असत्कृत्वा न विश्वसेत् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रासञ्शिल्पिनः प्राज्ञाः शतशो दत्तवेतनाः |
७८ क
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रासनानि मुख्यानि यानानि शय़नानि च |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
तत्रासनेषु विविधेष्वासीनाः पृथिवीक्षितः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राससादातिवलं भुजङ्गं; क्षुधार्दितं मृत्युमिवोग्ररूपम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तत्रासां चक्रिरे राजन्कृपप्रभृतय़ो रथाः ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तत्रासीत्तुमुलं युद्धं तावकानां परैः सह |
७० क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रासीत्तुमुलं युद्धं भीमसेनहिडिम्वय़ोः |
९६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
तत्रासीत्सुमहद्युद्धं तव तेषां च सङ्कुलम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तत्रासीत्सुमहद्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
तत्रासीत्सुमहद्युद्धं द्रोणस्याथ परैः सह |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
तत्रासीत्सुमहाञ्शव्दस्तुमुलो लोमहर्षणः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रासीदूर्जितं मृष्टं काञ्चनं महदासनम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
तत्रासीनः शुकस्तात मोक्षमेवानुचिन्तय़न् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
तत्रासीनस्य कौरव्य गौतमस्य सुखः शिवः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
तत्रासुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय़ वै |
६८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
तत्रासौ निरय़ं प्राप्तो वर्णभ्रष्टो वहिष्कृतः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रासौ प्रतिवसतीति ||
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
तत्रासौ भवने दिव्ये मुदा वसति देववत् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
तत्रासौ विपुलैर्भोगैः सर्वरत्नसमाय़ुतः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रास्तां रावणामात्यौ राक्षसौ शुकसारणौ |
५२ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
तत्रास्ति शय़नं भीरु दृढाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
तत्रास्त्रवीर्यं कर्णस्य लाघवं च महात्मनः |
७४ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
तत्रास्य दर्शय़िष्यामि पूर्वप्रेतान्पितामहान् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रास्य यदि साहाय़्यं कुर्याम सुकृतं भवेत् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तत्रास्य सुमहद्राजन्वाह्वोर्वलमदृश्यत |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रास्य स्वकृतं कर्म छाय़ेवानुगतं सदा |
२५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राहं गन्तुमिच्छामि यत्र ते भ्रातरो मम ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राहं तत्करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
तत्राहं दानवान्हत्वा सुवहून्देवकण्टकान् |
८३ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
तत्राहं देवगन्धर्वैः सहितो भुरिदक्षिण |
५३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
तत्राहं वाय़ुभक्षो वा निराहारोऽपि वा वसन् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तत्राहमद्भुतान्भावानपश्यं गिरिसत्तमे |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तत्राहमधिकः पार्थाद्धनुषा तेन पार्थिव ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
तत्राहमपि ते भक्तिमर्जुनं प्रति दृष्टवान् ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
तत्राहमपि हत्वा त्वां शौचं कर्तास्मि भार्गव ||
३४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतो नृप |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि ||
१३ ख