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शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
सम्पश्यन्नोपलिप्येत जले वारिचरो यथा ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पश्यन्स महातेजा वभूव मुदितस्तदा ||
११ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
सम्पश्यामो लोहिताभ्रप्रकाशां; देदीप्यन्तीमग्निशिखामिवोग्राम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
सम्पश्येमं भोगचय़ं महान्तं; सहास्माभिर्धृतराष्ट्रस्य राज्ञः ||
५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
सम्पातं चान्वपश्याम सङ्ग्रामे भृशदारुणे |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
सम्पातं समुदीर्णं च दर्शय़ामास पार्षतः ||
१४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
सम्पातं समुदीर्यं च दर्शय़ामास पाण्डवः ||
४५ ग
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पातिं जनय़ामास तथैव च जटाय़ुषम् |
६७ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्पातिर्नाम तस्याहं ज्येष्ठो भ्राता खगाधिपः |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सम्पातेष्वभिपातेषु निपातेष्वसिचर्मणोः |
६३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
सम्पादितं व्रह्मविदा पूर्वमेव पुरोधसा ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
सम्पाद्यमानं सम्यक्च स्यात्कर्म सफलं प्रभो |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
सम्पिण्डय़ति नः कालो वृद्धिं वार्धुषिको यथा ||
९७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
सम्पिष्टदग्धविध्वस्तं तव सैन्यं किरीटिना |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
सम्पीड्यमानस्तु शरौघवृष्ट्या; धनञ्जय़स्तान्युधि जातरोषः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
सम्पीड्यमानस्तैर्नागैर्वेदनार्तः शरातुरः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
सम्पीड्यमाना तु तदा सुजाता; विवर्धमानेन सुतेन कुक्षौ |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
सम्पीड्यमाना हि परे योगमाय़ान्ति सर्वशः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
सम्पीड्यात्मानमार्यत्वात्त्वय़ा कश्चिदुपस्कृतः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूजितश्चाप्यसकृच्छिरसा चाभिवादितः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
सम्पूजितस्तेन नरर्षभेण; ददर्श पुत्रं दिवि देवं यथेन्द्रम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
सम्पूजितो भवेत्पार्थ देवो नाराय़णः प्रभुः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूजितो मघवता वसुश्चेदिपतिस्तदा |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्य च द्विजान्सर्वांस्तथान्यान्विदुषो जनान् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्य च यथान्याय़ं धृतराष्ट्रं महीपतिम् |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्य पार्थं प्रय़यौ गृहान्प्रति शुभानना ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
सम्पूज्य वरदं देवं महादेवमथाव्रवीत् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
सम्पूज्य सर्वांस्त्रिदशानृषींश्चापि तपोधनान् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्य सहदेवं च सात्यकिं च महारथम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
सम्पूज्य स्वागतेनर्षिं विधिवत्पर्यतोषय़त् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सम्पूज्यते महाराज चातुर्वर्ण्येन नित्यदा ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सम्पूज्यते शल्मलिश्च द्वीपे शाल्मलिके नृप ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
सम्पूज्यमानः कुरुभिः कौरवाणां महारथः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्यमानः कुरुभिः संशृण्वन्विविधाः कथाः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
सम्पूज्यमानः कुरुभिर्महात्मा; रथर्षभः पाण्डुरवाजिय़ाता |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्यमानः परमर्षिसङ्घैः; परां मुदं पाण्डुसुतः स लेभे ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
सम्पूज्यमानः पाञ्चाल्यैर्मत्स्यैश्च भरतर्षभ |
११० क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्यमानः पौरैश्च व्राह्मणैश्च सहस्रशः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै; स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैरभिवाद्य महेश्वरम् |
७१ क
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैर्महात्मा; गन्धर्वतूर्येषु नदत्सु सर्वशः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैस्तथैव परमर्षिभिः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
सम्पूज्यमानाः पुरुषैर्विकुर्वन्ति मनो नृषु |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्यमानाः पौरैश्च व्राह्मणैश्च मनीषिभिः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
सम्पूज्यमानो युधि कौरवेय़ै; र्विजित्य सङ्ख्येऽरिगणान्सहस्रशः |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
सम्पूज्यमानौ समरे योधमुख्यैः सहस्रशः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
शुक्र उवाच
सम्पूज्या सततं राजन्मा चैनां शय़ने ह्वय़ेः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्पूज्याः सर्वलोकस्य तथा वृद्धाविमौ मम ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्याथाभ्यनुज्ञातो महर्षेर्वचनात्परम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्पूज्यापाक्रमत्तेन रथेनादित्यवर्चसा ||
४९ ख