chevron_left  व्याय़च्छमानाःarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
व्याय़च्छमानाः समरे किमन्यद्भागधेय़तः ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
व्याय़च्छमानाः सुभृशं कुरुपाण्डवसृञ्जय़ाः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
व्याय़ता वलिनः शूराः सलिलेष्वनिवर्तिनः |
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
व्याय़ता वाहवः पेतुश्छिन्नमुष्ट्याय़ुधाङ्गदाः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
व्याय़ताय़तवाहूनां व्याय़ताय़तवाहुभिः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
व्याय़म्य वहुधा नूनं सुखसुप्तः श्रमादिव |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
व्याय़म्य संय़ुगे राजा दृष्ट्वा च पितरं हतम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
व्याय़ामं मुष्टिभिः कृत्वा तलैरपि समाहतौ |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
व्याय़ामः कर्कशत्वं च वीर्यं च पुरुषे गुणाः ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
व्याय़ामकर्शितः सोऽथ मृगलिप्सुः पिपासितः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
व्याय़ामक्लान्तहृदय़ाः पतन्ति स्म विचेतसः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
व्याय़ामप्रद्रुतौ तौ तु वृषभाक्षौ तरस्विनौ |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
व्याय़ाममतिमात्रं वा व्यवाय़ं चोपसेवते |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
व्याय़ामशीलाः सततं भृतपुत्राः कुलोद्गताः ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
धृतराष्ट्र उवाच
व्याय़ामश्चाय़मत्यर्थं कृतस्त्वामभिय़ाचता |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
व्याय़ामसहमत्यर्थं तृणराजसमं महत् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
व्याय़ामेन च तेनास्य जज्ञे शिरसि वेदना ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
व्याय़ामेन परीप्सस्व जीवितं कौरवात्मज ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
व्याय़ामेन ममानेन जाता शिरसि वेदना ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
व्याय़ामेनाहरिष्यामि यज्ञानन्यानतिव्रतान् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
व्याय़ुधं चैनमालक्ष्य शरैः संनतपर्वभिः |
८९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
व्याय़ुधं नावधीच्चैनं कर्णः कुन्त्या वचः स्मरन् ||
६७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
व्युक्षन्सर्वाण्यनीकानि तदद्भुतमिवाभवत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
व्युच्चरंश्च महादोषं नर एवापराध्यति ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
व्युच्चरन्त्याः पतिं नार्या अद्य प्रभृति पातकम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
व्युच्छिद्यन्ते क्रिय़ाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
व्युत्क्रम्य समय़ं राजन्धार्तराष्ट्रं महावलम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भृगुरु उवाच
व्युत्क्रान्तधर्मं तमहं धर्षणामर्षितो भृशम् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
व्युत्क्रान्ताः समदृश्यन्त तत्र तत्र महारणे ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
व्युत्क्रान्तानपरान्योधांश्छादय़ित्वा तरस्विनः |
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
युधिष्ठिर उवाच
व्युत्क्रामन्ति स्वधर्मेभ्यः क्षत्रस्य क्षीय़ते वलम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
व्युत्थानं चात्र काङ्क्षद्भिः कथाभिः प्रविलोभ्यते |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय १९३
दुर्योधन उवाच
व्युत्थापय़न्तु वा कृष्णां वहुत्वात्सुकरं हि तत् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
व्युत्थितोत्पत्तिविज्ञानमाकाशे च गतिः सदा |
९ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
व्युत्पन्ने कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
व्युपारमत्ततः पार्थः कनीय़ान्प्रत्यभाषत ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
व्युपारम्य ततो युद्धाद्योधाः शतसहस्रशः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
व्युषिताश्व इति ख्यातो वभूव किल पार्थिवः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
व्युषिताश्वः समुद्रान्तां विजित्येमां वसुन्धराम् |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
व्युषिताश्वस्ततो राजन्नति मर्त्यान्व्यरोचत |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मनः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
व्युषिताय़ां च शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे |
१ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
व्युषिताय़ां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
व्युषिताय़ां रजन्यां तु धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
व्युषिताय़ां रजन्यां तु राजा दुर्योधनस्ततः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
व्युषितो रजनीं चाहं कृत्वा पूर्वाह्णिकक्रिय़ाम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
व्युष्टां निशां भारत भारताना; मनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
व्युष्टाय़ां चैव शर्वर्यां यच्चकार निवोध तत् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
व्युष्टाय़ां तु महाराज रजन्यां सर्वपार्थिवाः |
१ क