द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रहारमकुर्वंस्ते सर्वे सप्त महारथाः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रहारे सुतुमुले तव तेषां च भारत ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
नारद उवाच
सम्प्रहृष्टमना नित्यं विशोक इव लक्ष्यसे ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रहृष्टमना राजन्गदामादाय़ कौरवः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
सम्प्रहृष्टमनाश्चापि रामात्परमसंमतम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
सम्प्रहृष्टैः प्रनृत्यद्भिः शर्वस्तत्र निषेव्यते ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राकम्पत हर्षेण कृष्णागमनकाङ्क्षय़ा ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
सम्प्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे; पराभूते पौरुषे धार्तराष्ट्रे |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रादृश्यन्त सङ्क्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
सम्प्राद्रवंश्चेदिपतिं विहाय़; सिंहं दृष्ट्वा क्षुद्रमृगा इवान्ये ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवच्चमूः सर्वा धर्मराजस्य पश्यतः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राद्रवच्चमूः सर्वा धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवच्चमूः सर्वा भारद्वाजस्य पश्यतः ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवत्सु दारेषु क्षत्रिय़ाणां महात्मनाम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवत्सुसन्त्रस्ता सिंहेनेवार्दिता मृगी ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवद्दिशो राजन्काल्यमानं महारथैः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवद्रणे राजन्निशीथे भैरवे सति ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवद्वलं सर्वं पुत्राणां ते विशां पते ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवन्त समरे निर्जिताः सव्यसाचिना ||
१२१ ग
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
सम्प्राद्रवन्दानवेन्द्रा दारय़न्तो वसुन्धराम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवन्महाराज व्यथितं वै सनाय़कम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राद्रवन्यतो राजा धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राद्रवन्हते शल्ये अङ्कुशाङ्गुष्ठचोदिताः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्प्राप्त इति तं रामः प्रिय़वादिनमर्चय़त् ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
सम्प्राप्तं तदिदं द्यूतं यत्तच्छकुनिवुद्धिजम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
सम्प्राप्तं वहु मन्तव्यं विमृशस्यवुधो यथा ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राप्तं सुमहद्घोरं फलं किम्पाकसंनिभम् |
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राप्तः कारपचनं तीर्थप्रवरमुत्तमम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राप्तः कीर्तिमतुलां पाण्डवेय़ भविष्यसि ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राप्तः परमं योगं सिद्धिं च परमां गतः ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
सम्प्राप्तकालं दातव्यं ददासि न विकर्षसि ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राप्तमपि नेय़ेष परावृत्तं महाद्विपम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
नाग उवाच
सम्प्राप्तश्च भवानद्य कृतार्थः प्रतिय़ास्यति |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
सम्प्राप्तस्त्रिदिवे राज्यं वृत्रहा वसुभिः सह ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
व्राह्मण उवाच
सम्प्राप्तस्यैव चाव्यग्रमावेद्योऽहमिहागतः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
सम्प्राप्ता दर्शनं देवी शक्रस्य महिषी प्रिय़ा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
सम्प्राप्ता वहवः सिद्धिमप्यवाधां सुखोदय़ाम् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राप्ताः सिन्धुराजस्य समीपमरिकर्शनाः |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
सम्प्राप्तानां च पूज्यानां कामादर्थेषु देवल |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
सम्प्राप्तास्ते गतिं पुण्यां तस्मान्मा शोच पुत्रक ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
सम्प्राप्तिश्चक्रधनुषोः खाण्डवस्य च दाहनम् ||
९३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
सम्प्राप्तुमिन्द्रिय़ाणां तु संय़मेनैव शक्यते ||
९ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
इन्द्र उवाच
सम्प्राप्तोऽद्य स्वर्गसुखानि च त्वं; त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति ||
८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
सम्प्राप्तोऽद्याय़मस्यान्तः कुलस्य पुरुषर्षभ |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राप्तय़ौवनं पश्यन्भ्रातरं धीमतां वरम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
सम्प्राप्तय़ौवनां पश्यन्देय़ां दुहितरं तु ताम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
सम्प्राप्नुवन्त्वद्य सहैव तेन; रिपुं जय़ामो नहुषं घोरदृष्टिम् ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राप्नुहि त्वय़ा प्राप्ते कृतकृत्यास्ततो वय़म् ||
२३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
सम्प्राप्य तानि प्रीतात्मा गुरोर्वचनकारकः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राप्य तु ततो राजा भीष्मस्य सदनं शुभम् |
३३ क