वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
सम्प्राप्य दिवमाकाशमादित्यसदने स्थितः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राप्य नगराभ्याशमवतारय़दर्जुनः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राप्य भारतीमध्यं तलघोषसमाकुलम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राप्य मध्यं व्यूहस्य न भीः पाण्डवमाविशत् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
सम्प्राप्य व्रह्मणः काय़ं तस्मात्तद्व्रह्म शाश्वतम् |
६ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
सम्प्राप्य सत्कारमतीव तेभ्यः; प्रोवाच कस्य प्रथिताः स्थ सौम्याः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राप्य हास्तिनपुरं शीघ्रं च प्रविवेश ह |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राप्यैव गता नाशं शलभा इव पावकम् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रावेपन्त कुरवो गावः शीतार्दिता इव ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राय़ाज्जवनैरश्वैर्द्रोणानीकाय़ सौवलः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
सम्प्राय़ात्सह गान्धारैर्वृतस्तैश्च महारथैः |
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्राय़ुध्यद्धनुष्कोट्या कौन्तेय़ः परवीरहा |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रीतमनसः सर्वे देवलोक इवामराः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रीतिभोज्यान्यन्नानि आपद्भोज्यानि वा पुनः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रीतिमाञ्जनस्तत्र सन्तुष्टः शुचिरव्ययः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रकाः |
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
सम्प्रीय़माणं त्वां व्रूय़ाद्राजन्दूर्योधनं तथा |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रीय़माणः पाण्डूनामृषभः पुत्रविक्रमात् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रीय़माणा वहवोऽभिजग्मु; र्गन्धर्वसङ्घाश्च महर्षय़श्च ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रीय़माणो मित्रैश्च चिरं भद्राण्यवाप्स्यसि ||
६१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रीय़माणो राजानं युधिष्ठिरमथाव्रवीत् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
सम्प्रेक्षमाणा पुत्रं ते नानुरूपमिवात्मनः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रेक्ष्य च महावाहुः पार्थस्य मृदुय़ुद्धताम् ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रेक्ष्य तानापततः सङ्क्रुद्धाञ्जातसम्भ्रमान् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकय़न् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
सम्प्रेक्ष्य भरतश्रेष्ठः कृपां चक्रे नराधिपः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त; मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रेक्ष्य वाणान्निहतांस्तदानीं; सुदर्शनः सात्यकिवाणवेगैः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रेक्ष्य वै महावुद्धिश्चिन्तय़ित्वा च भारत ||
९५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रेक्ष्य समरे भीमं रक्षसा ग्रस्तमन्तिकात् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रेक्ष्यान्योन्यमासीना हृदय़ैस्तामधारय़न् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
सम्प्रेक्ष्योवाच स नृपं क्षिप्रमागम्यतामिति ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
सम्प्रेषितश्च तेनाय़ं काश्यपेन ममान्तिकम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
सम्प्रेषिताय़ामथ चैव दास्या; मुत्थाय़ सर्वं स्वय़मेव कुर्याः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रेष्यमाणो नागेन्द्रो वज्रदत्तेन धीमता |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रेषय़च्छितान्पार्थः शरानाशीविषोपमान् ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
सम्प्रेषय़ामास सुचारुरूपाः; शिखण्डिनं स्त्री पुमान्वेति वेत्तुम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रैक्षत्तावकं सैन्यं व्याघ्रो मृगगणानिव ||
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रैक्षन्त जनास्तत्र युध्यमानौ युधां पती |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रय़ातं महाराज निनीषन्तं गवां पदम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रय़ातान्कुरून्दृष्ट्वा पाण्डवानां महाचमूः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
सम्प्रय़ुक्तः किलैवाय़ं दिष्टैर्भवति पूरुषः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रय़ुक्तश्च कुन्त्या च माद्र्या च भरतर्षभ |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रय़ुद्धा वय़ं पञ्च किरीटिशरपीडिताः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
सम्प्रय़ुद्धे प्रहृष्टे वा सत्यं वा यदि वानृतम् |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रय़ुद्धौ रणे दृष्ट्वा तावुभौ नरराक्षसौ |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
सम्प्रय़ोगस्तय़ोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोर्ध्रुवः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
सम्प्रय़ोगो भवेन्नाय़ं मम मोघस्त्वय़ा द्विज ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
सम्प्रय़ोज्य विय़ोज्याय़ं कामकारकरः प्रभुः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्लावय़न्महीं सर्वां मानवैरास्तरंस्तदा |
१७ क