वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
सम्भक्ष्य जरय़िष्यामि यथागस्त्यो महासुरम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भक्ष्य सर्वभूतानि कृत्वा चैकार्णवं जगत् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भक्षय़ति भूतानि तस्मै घोरात्मने नमः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सम्भग्न इव वातेन वहुशाखो वनस्पतिः ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
सम्भग्नं हि वलं दृष्ट्वा वलात्पार्थेन तावकम् |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
सम्भग्ना इव वातेन कर्णिकाराः सुपुष्पिताः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
सम्भवं च विनाशं च भूतानां चेष्टितं तथा |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्भवत्येव युगपद्योनौ नास्त्यन्तराभवः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
सम्भवन्ति ततः शुक्रात्प्राणिनः पृथिवीपते |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भारांस्तीर्थय़ात्राय़ां सर्वोपकरणानि च |
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
व्यास उवाच
सम्भाराः सम्भ्रिय़न्तां ते यज्ञार्थं पुरुषर्षभ ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्भाराः सम्भ्रिय़न्तां मे रामश्चोपनिमन्त्र्यताम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
सम्भारानभिषेकार्थं कारय़ामास शास्त्रतः |
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भाराश्चैव राजेन्द्र सर्वे सङ्कल्पिताभवन् ||
७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
सम्भावना हि लोकस्य तव पार्थस्य चोभय़ोः |
९४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
सम्भावितश्च लोकस्य संमतश्चासि भारत ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भाविता जातवलास्ते दद्युर्यदि नः सुखम् |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सम्भावितात्मा सम्भाव्य भृशं प्रीतस्तदाभवन् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३८
शूद्र उवाच
सम्भावितो हि तूर्णेन शूलहस्तेन रक्षसा ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सम्भावितोऽस्मि गोविन्द त्रैलोक्येनाद्य संय़ुगे ||
६१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सम्भावितोऽस्म्यन्धकवृष्णिनाथ; लोकैस्त्रिभिर्वीर तवाभिय़ानात् ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सम्भाव्य चटकान्मूर्ध्नि जाजलिर्जपतां वरः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
सम्भाव्य पुत्रान्कालेन यौवनस्थान्निवेश्य च |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
सम्भाव्यं गोषु सम्पन्नं सम्भाव्यं व्राह्मणे तपः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
सम्भाव्यं स्त्रीषु चापल्यं सम्भाव्यं ज्ञातितो भय़म् ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भाव्यमस्मिन्कर्मेदमुत्साहाच्चानुमीय़ते |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सम्भावय़त चात्मानमव्यग्रमनसो युधि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
सम्भावय़ति मातेव दीनमभ्यवपद्यते |
१०१ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
सम्भावय़ति यद्येवं त्वद्वाक्याच्च जनार्दनः |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
तुलाधार उवाच
सम्भावय़न्ति पितरं त्वय़ा सम्भाविताः खगाः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
सम्भाषमाणमेकान्ते समासीनं च तैः सह |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भाष्य सुचिरं कालं मन्त्रय़ित्वा पुनः पुनः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भाष्यमाणा अपि ते न किञ्चित्प्रत्यपूजय़न् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
सम्भिन्नवर्मघण्टाश्च संनिकृत्तमहाध्वजाः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्भूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
सम्भूतः कौरवश्रेष्ठ शिखण्डी रथसत्तमः ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्भूतः सम्भलग्रामे व्राह्मणावसथे शुभे |
९० क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
सम्भूता वहवो वंशा भूतसर्गाः सविस्तराः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भूताः कीर्तिमन्तस्ते कुरुवंशविवर्धनाः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भूताः पुरुषव्याघ्र स हि लोकपितामहः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
सम्भूतानीह युगपन्मनसा सह पार्थिव ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सम्भूय़ दशवर्गोऽय़ं भुङ्क्ते राज्यं हि राजवत् ||
१५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
सम्भूय़ भ्रातृभिः सार्धं भुङ्क्ष्व भोगाञ्जनाधिप ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
सम्भूय़ सर्वैरस्माभिः कार्यः सर्वात्मना वधः ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
द्रौपद्यु उवाच
सम्भूय़ सर्वैश्च जितोऽपि यस्मा; त्पश्चाच्च यत्कैतवमभ्युपेतः ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्भूय़ सुखमेधन्ते भारतान्धकवृष्णय़ः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
सम्भृता चैव विद्येय़ं तपसेह पुरा मय़ा |
३८ क