वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
आर्ता स्कन्दं समासाद्य पुनर्वलवती वभौ ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
आर्तां तामाह स मुनिः शैखावत्यो महातपाः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
आर्तां पृथां सान्त्वितां केशवेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
आर्तामुपप्लुतां दीनां निमग्नां शोकसागरे ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
आर्ताहं प्रलपामीदमिति मां विद्धि भारत |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
आर्ताय़निं त्रिभिर्वाणै राजानं चापि पञ्चभिः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
आर्ताय़निः समरे दुष्प्रकम्प्यः; सेनाग्रणीः प्रथमस्तावकानाम् |
९४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
आर्ताय़निममेय़ात्मा विव्याध विशिखैस्त्रिभिः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
आर्ताय़निमहं जाने यथातत्त्वेन भारत ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
आर्ताय़निरमित्रघ्नः क्रुद्धः सौभद्रमभ्ययात् ||
८० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
आर्तिं च परमां राजा जगाम सह भार्यया |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
आर्तिं परमिकां जग्मुस्ते तदा मय़ि पातिते ||
११ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
आर्तिं मे हृदय़े रूढां महतीं पुत्रकारिताम् |
७० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
आर्तिं राजा यय़ौ तूर्णं कौन्तेय़ः परवीरहा ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
आर्तिः परा माविशति यतः शंससि मे हतम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
आर्तिजं तस्य विप्रस्य सभार्यस्य विशां पते ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
आर्तिमार्छत्परां राजा सह भृत्यैः पुरेण च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
वृहस्पतिरु उवाच
आर्तिरार्ते प्रिय़े प्रीतिरेतावन्मित्रलक्षणम् |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
आर्तो न जुहुय़ादग्निं त्रिरात्रं यस्तु व्राह्मणः |
२९ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
आर्तो वन्धुप्रिय़ः शूरो नकुलो निपपात ह ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
आर्तो वा व्याधितो वापि गच्छेदनशनं तु यः |
५३ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
आर्तय़ैतन्मय़ा भीम कृतं वाष्पविमोक्षणम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
आर्द्र एव तु वासांसि नित्यं सेवेत मानवः |
७५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
आर्द्रं वाप्यथ वा शुष्कं पच्यमानमथापि वा ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो वर्षाणां जीवते शतम् ||
२९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
आर्द्रवस्त्रेण षण्मासं विहार्यं भस्मशाय़िना ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
आर्द्रस्य युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्तस्य चात्मजः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
आर्द्राय़ां कृसरं दत्त्वा तैलमिश्रमुपोषितः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
आर्दय़द्वहुशः कर्णो न चैनं समपीडय़त् ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
नागभार्यो उवाच
आर्य सूर्यरथं वोढुं गतोऽसौ मासचारिकः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
आर्यं युद्धमकुर्वन्त परस्परजिगीषवः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
आर्यकर्मणि युञ्जानः पापे वा पुनरीश्वरः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
आर्यकश्चादिकश्चैव नागश्च शलपोतकः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
आर्यकस्य मतः पौत्रो दौहित्रो वामनस्य च ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
आर्यको नन्दकश्चैव तथा कलशपोतकौ |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
आर्यजुष्टमिदं वृत्तमिति विज्ञाय़ शाश्वतम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
आर्यता नाम भूतानां यः करोति प्रय़त्नतः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
युधिष्ठिर उवाच
आर्यरूपमिवानार्यं कथं विद्यामहे नृप ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
आर्यरूपसमाचारं चरन्तं कृतके पथि |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
आर्यवृत्तश्च पाञ्चाल्यो न स राजा धनप्रिय़ः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
आर्यवृत्तौ महेष्वासौ स्नेहपाशसितावुभौ ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
आर्यव्रतं तु जानन्तः सङ्गरान्न विभित्सवः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
आर्यव्रतममोघेषुं ह्रीमन्तमपराजितम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
आर्यशास्त्रातिगे क्रूरे लुव्धे धर्मापचाय़िनि |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१६९
गन्धर्व उवाच
आर्यस्त्वेष पिता तस्य पितुस्तव महात्मनः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
आर्यस्य मन्ये मरणाद्गरीय़ो; यद्धर्ममुत्क्रम्य महीं प्रशिष्यात् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
आर्या पलाला वै मित्रा सप्तैताः शिशुमातरः ||
९ ग