शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
सम्राड्विराट्स्वराट्चैव सुरराड्धर्मदो भवः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
सम्वद्धाः पुरुषैराप्तैरभिजातैः स्वदेशजैः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सम्वन्धः कोऽस्ति भूतानां स्वैरप्यवय़वैरिह ||
१२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
सम्वन्धकं चैव समर्थ्य तस्मि; न्दाशार्णके वै नृपतौ नरेन्द्र |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
सम्वन्धकेन राजेन्द्र तौ तु वीर्यवलान्वय़ात् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
सम्वन्धस्तोय़विन्दूनां पर्णे कोकनदस्य च ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
सम्वन्धितां चापि समीक्ष्य तेषां; मतिं कुरुध्वं सहिताः पृथक्च ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
सम्वन्धिनं च सम्वन्धी स्वस्रीय़ं चापि मातुलः ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
सम्वन्धिनः प्रिय़ास्तस्माच्छप्स्येऽहं त्वामसंशय़म् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्वन्धिनः सुदय़ितान्सततं वृष्णिपुङ्गव ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
सम्वन्धिनश्चेन्द्रवीर्याः स्वनुरक्ताः प्रहारिणः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
सम्वन्धिनस्ते भ्रातॄंश्च सहाय़ान्मातुलांस्तथा ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
सम्वन्धिना समागम्य हृष्टो वासमुवास ह ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
सम्वन्धिनां च राजेन्द्र तथाय़ुर्विन्दते महत् ||
११० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
सम्वन्धिनो वय़स्यांश्च मातुलान्वान्धवांस्तथा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्वन्धिनोऽतिथीन्भृत्यान्संश्रितोपाश्रितांश्च यः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
सम्वन्धिभावं रक्षन्तौ महत्कर्म करिष्यतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
सम्वन्धिवान्धवा दिक्षु पृथिव्यां मातृमातुलौ |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
सम्वन्धिवान्धवाश्चैव योध्या वै क्षत्रजीविना ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
सम्वन्धिषु समां वृत्तिं वर्तस्व मधुसूदन ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्वन्धी दय़ितश्चासि धृतराष्ट्रस्य माधव ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
अर्जुन उवाच
सम्वन्धी दय़ितो नित्यमुभय़ोः पक्षय़ोरपि ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
सम्वन्धी वासुदेवश्च येषां श्यालश्च पार्षतः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
सम्वभूव ततः कामी तय़ा सार्धमकामय़ा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
सम्वभूव तय़ा रात्रौ मातुः प्रिय़चिकीर्षय़ा |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सम्वभूव महाराज समवाप च यौवनम् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
सम्वभूव मही कीर्णा मेघैर्द्यौरिव शारदी ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सम्वभूवुरनीकेषु वहवो भैरवस्वनाः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
पिङ्गलो उवाच
सम्वुद्धाहं निराकारा नाहमद्याजितेन्द्रिय़ा ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
सम्वुवोधय़िषुर्मित्रं सदश्वमिव सारथिः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
समय़ं कृतमिच्छामि वर्तितव्यं यथा मय़ि ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ं कौरवाग्र्यस्य सस्मार पुरुषर्षभः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
समय़ं चक्रिरे तत्र मन्त्रवुद्धिविशारदाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ं चक्रिरे राजंस्तेऽन्योन्येन समागताः |
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
समय़ं रक्षमाणानां भार्या वो न भविष्यति ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ं वाजिमेधस्य विदित्वा पुरुषर्षभः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ं समय़ज्ञास्ते पालय़न्तः शुचिव्रताः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ः परिपाल्यो नो यावद्वर्षं त्रय़ोदशम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ः समतिक्रान्तो भवत्सन्दर्शनान्मय़ा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
भीष्म उवाच
समय़त्यागिनो लुव्धान्गुरूनपि च केशव |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
समय़श्च मय़ा पूर्वं कृतो वः शत्रुकर्शन |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
शल्य उवाच
समय़श्च हि मे वीर कश्चिद्वैकर्तनं प्रति |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
समय़स्तु कृतः कश्चिद्भीष्मेण मम माधव |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
समय़ा सान्त्वितो वाग्भिः स्वागतेनाभिपूजितः |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ुज्यत तीव्रेण श्रमेण पुरुषादकः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
समय़ुज्यत देहस्य कालपर्याय़धर्मणा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
समय़ुज्यत लोकैः स्वैर्भरतानां कुलोद्वहः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
समय़े च प्रिय़ालापः स्वय़ूथेषु च संनतिः |
८० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
समय़े चागमत्तं वै शिखण्डी स क्षपाचरम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
समय़े तं ततो राज्ये वृहदश्वोऽभ्यषेचय़त् |
६ ख