शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वती ओघवती सुवेणुर्विमलोदका ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
सरस्वती नदी सद्भिः सततं पार्थ पूजिता |
९ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
सरस्वती पुण्यवहा ह्रदिनी वनमालिनी |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या; सरस्वती लोकसुखावहा सदा |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सरस्वतीं गोपय़ानो व्रह्मचर्यं समाचरन् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
सरस्वतीं च वेदांश्च मनसः ससृजेऽच्युतः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीं ततः सोमो जगाम ऋषिशासनात् |
६९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीं ततो गत्वा स राजा वकमव्रवीत् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीं तथा दृष्ट्वा वभूवुर्भृशदुःखिताः ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीं प्रतिस्रोतः समुद्रादभिजग्मिवान् ||
१८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीं प्राप्य जनाः सुदुष्कृताः; सदा न शोचन्ति परत्र चेह च ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीं प्राप्य दिवं गता जनाः; सदा स्मरिष्यन्ति नदीं सरस्वतीम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीं प्रीतिय़ुताश्चरन्तः; सुखं विजह्रुर्नरदेवपुत्राः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
सरस्वतीं वहुविधां यूय़मुच्चारय़िष्यथ ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीं विंशतिं च गङ्गामनु चतुर्दश ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
सरस्वतीं समासाद्य तर्पय़ेत्पितृदेवताः |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सरस्वतीः सुपुण्याश्च सर्वा गङ्गाश्च मारिष |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीतीररुहैर्वन्धनैः स्यन्दनैस्तथा |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीतीर्थवरं नानाद्विजगणाय़ुतम् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां च निषेव्य ते |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां ये प्रय़ान्ति च ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
सरस्वतीदृषद्वत्यौ सेवमानोऽनुसञ्चरेः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
सरस्वतीनैमिषपुष्करेषु; ये चाप्यन्ये पुण्यदेशाः पृथिव्याम् ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीभिः पुण्याभिर्दिव्यतोय़ाभिरेव तु ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
सरस्वतीमिमां पुण्यां पश्यैकशरणावृताम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
द्वारपाल उवाच
सरस्वतीमीरय़ वेदजुष्टा; मेकाक्षरां वहुरूपां विराजम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीमुच्चचार तत्र सारस्वतोऽभवत् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीमेत्य निवासकामाः; सरस्ततो द्वैतवनं प्रतीय़ुः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वतीवाससमा कुतो रतिः; सरस्वतीवाससमाः कुतो गुणाः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
सरस्वतीह वाग्भूता शरीरं ते प्रवेक्ष्यति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सरस्वत्या महापुण्यमुपासन्ते जनार्दनम् ||
१३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
सरस्वत्या यमुनय़ा कुरुक्षेत्रेण चापि ये ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वत्या वरे तीर्थे उन्मज्जञ्शशलक्षणः |
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सरस्वत्यां महाराज अनु संवत्सरं हि ते |
१२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वत्यां महाराज चस्कन्दे वीर्यमम्भसि ||
३० ग
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
सरस्वत्याः परे पारे नानाद्रुमलतावृतम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
जनमेजय़ उवाच
सरस्वत्याः प्रभावोऽय़मुक्तस्ते द्विजसत्तम |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वत्याः शुभे तीर्थे विहिता वै महात्मना |
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वत्याः सिद्धगणस्य चैव; पूष्णश्च ये चाप्यमरास्तथान्ये |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
सरस्वत्यामुपस्पृश्य विमानस्थो विराजते ||
१३९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
सरस्वत्यारुणाय़ाश्च सङ्गमं लोकविश्रुतम् ||
१३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
सरस्वत्याश्च तीर्थानां पुण्यता परिकीर्तिता ||
१७५ ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ||
१२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो वली ||
२० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
गार्ग्य उवाच
सरस्वत्यास्तटे तुष्टो मनोय़ज्ञेन पाण्डव ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वत्यास्तीर्थवरं ख्यातमौशनसं तदा |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वत्युत्तरे तीरे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
सरस्वत्यै वरं प्रादात्प्रीय़माणो महामुनिः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
सरहस्यव्रतं चैव धनुर्वेदमशेषतः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि च नदीश्चैव वनानि विविधानि च |
३ क