विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
सर्वं यथावच्चरितं यद्यदेभिः परिश्रुतम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं यावद्वेत्थ तस्मिन्यथाव; द्याथातथ्यं वासुदेवेऽर्जुने च ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं राज्ञः समुदय़माय़ं च व्ययमेव च |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं राज्ञे द्रुपदाय़ाखिलेन; निवेदय़िष्यंस्त्वरितो जगाम ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वं राज्ञे यथावृत्तं रावणाय़ न्यवेदय़न् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
सर्वं राज्यं तवाद्यास्तु भार्या मे भव शोभने ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
सर्वं वर्षाभिनिर्वृत्तमन्नं सम्भवति प्रभो ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
सर्वं वलवतां धर्मः सर्वं वलवतां स्वकम् ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
सर्वं वलवतां पथ्यं सर्वं वलवतां शुचि |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
सर्वं विकारं दृष्ट्वा तु पुण्यश्लोकस्य धीमतः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
सर्वं विदुर्वेदविदो वेदे सर्वं प्रतिष्ठितम् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
सर्वं विश्रावय़ामास यथा भूतं महाद्युते ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
सर्वं विसर्जय़ामास तमेकं सचिवं विना ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
शौनक उवाच
सर्वं विस्तरतस्तात भवाञ्शंसितुमर्हति |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
सर्वं वै तपसाभ्येति तपो हि वलवत्तरम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
सर्वं वैनय़िकं कृत्वा विनय़ज्ञो वृहस्पतेः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
सर्वं व्यपानुदत्कृष्णः कुशलो ह्यश्वकर्मणि ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
सर्वं व्याचष्ट दुर्धर्षो वासुदेवः किरीटिने |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
इन्द्र उवाच
सर्वं व्याप्तमिदं देवा वृत्रेण जगदव्ययम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वं व्याप्तमिदं व्रह्मन्प्राणिभिः प्राणिजीवनैः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
सर्वं शरीरात्मनि यः प्रवेद; तस्मै स्म देवाः स्पृहय़न्ति नित्यम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
सर्वं श्रेष्ठं वरिष्ठं च निवेद्यं तस्य धर्मतः ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं संशय़ितं राजन्नगरं ते भविष्यति ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
सर्वं सञ्छिद्य दुर्धर्षो गदां खड्गमथापि च ||
१२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
सर्वं सन्तानमेतेषामिदमित्युपधारय़ ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
वृहस्पतिरु उवाच
सर्वं सम्भावय़ाम्यस्मिन्नसाध्यमपि साधय़ेत् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
सर्वं सर्वेण सर्वत्र क्रिय़माणं च पूजय़ |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
सर्वं साध्वर्थमेवेदमसाध्वर्थं न किञ्चन ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
सर्वं सुखं यच्छिवमुत्तमं च; व्रह्माव्यक्तं प्रभवश्चाव्ययश्च ||
४४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं सुहृज्जनं चैव सर्वाश्च प्रकृतीस्तथा |
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं स्विष्टकृतं कृत्वा विधिवद्वेदपारगः |
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वं हि तेन प्राक्तदा वित्तमासी; द्गान्धार्या यद्वाक्यमुक्तः स पूर्वम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
सर्वं हि नौ संविदितं त्रैलोक्ये सचराचरे |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
सर्वं हि विद्यते तेषु शिष्टाचारः सुदुर्लभः ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
सर्वं हि वेत्थ विप्र त्वं यदेतत्कीर्तितं मय़ा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
सर्वं हीदं स्वकृतं मे ज्वलाम्यग्नाविवाहितः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
सर्वं ह्यद्यातुरं मन्ये नैतदस्ति वलं मम ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
सर्वः कालवशं याति शुभाशुभसमन्वितः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
सर्वः सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
सर्वः सुहृज्जनस्ताभ्यां प्रमोदमुपजग्मिवान् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सर्वः स्वे स्वे गृहे राजा सर्वः स्वे स्वे गृहे गृही |
१४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
सर्वकर्मसु दृश्यन्ते प्रशान्तेष्वितरेषु च |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
सर्वकर्मसु यः शुद्धः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरव्रवीत् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सर्वकर्मा स्वय़म्भूश्च आदिरादिकरो निधिः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
सर्वकर्माणि कुरुते तस्यर्षेः शूद्रवद्धि सः |
६९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी |
१३ क