भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय़ः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
सर्वकर्मेत्यभिख्यातः स मां रक्षतु पार्थिवः ||
६९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
सर्वकल्याणसम्पूर्णः सर्वौषधिसमन्वितः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
सर्वकाननदेशज्ञः पारिय़ात्रचरः सदा |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वकामक्रिय़ाभिश्च सर्वेषां तुष्टिमावहत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सर्वकामगमे दिव्ये कल्पाय़ुतशतं समाः ||
११४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
सर्वकामगुणोपेतं वीतशोकमनामय़म् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वकामगुणोपेतमन्नं गाश्च धनानि च |
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
सर्वकामदमित्याहुस्तत्र हव्यमुदावहत् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
सर्वकामदुघा नाम धेनुर्धारय़ते दिशम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सर्वकामदुघां धेनुं सर्वकामपुरोगमाम् |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
सर्वकामफलः पुण्यः सिद्धचारणसेवितः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
सर्वकामफलांश्चैव वृक्षान्भवनसंस्थितान् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
सर्वकामफलानीह गावः पृथ्वी सरस्वती ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
सर्वकामफलाश्चापि वृक्षा भवनसंस्थिताः |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
सर्वकामफलास्तत्र केचिद्वृक्षा जनाधिप |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
सर्वकामरसैर्हीनाः स्थानभ्रष्टा अकिञ्चनाः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
सर्वकामसमाय़ुक्तः प्रेत्य चाप्यश्नुते फलम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सर्वकामसमाय़ुक्तां काश्यपीं यः प्रय़च्छति |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सर्वकामसमाय़ुक्ताः शूरा धर्मार्थनिश्चिताः |
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वकामसमृद्धं तदन्नं वुभुजिरे शनैः ||
३० ग
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य लभते फलम् ||
११२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वकामसमृद्धार्थं मेने आत्मानमात्मना |
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
सर्वकामसमृद्धार्था निःशोका गतमन्यवः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
सर्वकामानवाप्नोति कीर्तिं चैवेह शाश्वतीम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
सर्वकामान्परित्यज्य तपस्तप्तं तदा मय़ा |
६३ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वकामाश्च कार्यन्तां रसगन्धसमन्विताः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
सर्वकामैः स यजते यस्तिलैर्यजते पितॄन् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
सर्वकामैः संविभक्तः पूजितश्च सदा भृशम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
७६
नल उवाच
सर्वकामैः सुविहितः सुखमस्म्युषितस्त्वय़ि |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
सर्वकामैः सुविहिता रक्ष्यमाणा सदा त्वय़ा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वकामैः सुविहितौ निवसावोऽस्य वेश्मनि ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
सर्वकामैः सुसिद्धार्थो लव्धवान्परमां मुदम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
सर्वकामैर्वृताः केचिद्धेमाभरणभूषिताः ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
सर्वकामैश्च सम्पूर्णं दत्त्वा वेश्म हिरण्मय़म् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सर्वकार्याणि कर्ताहं प्रिय़ाणि च हितानि च ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
सर्वकार्यापराध्यत्वान्नापराध्यन्ति चाङ्गनाः ||
३७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सर्वकालप्रसादश्च सुवलो वलरूपधृक् ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सर्वकालिङ्गमुख्यैश्च कलिङ्गाधिपतिर्वृतः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सर्वकालिङ्गसैन्यानां मनांसि समकम्पय़त् ||
७७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सर्वकालिङ्गय़ोधेषु पाण्डूनां ध्वजिनीपतिः |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वकौशलसंय़ुक्तं सूक्ष्मचित्रार्थवच्छुभम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
युधिष्ठिर उवाच
सर्वक्रतुषु चोद्दिष्टं भूमिर्गावोऽथ काञ्चनम् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वक्षत्रस्य चाचार्यः सर्वशस्त्रभृतां वरः |
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
सर्वक्षत्रस्य मिषतो रथेनैकेन दंशितौ |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
सर्वक्षीरान्नभोक्तारः पापाचारा रणाजिरे |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
सर्वक्षय़ो दृश्यते यत्र कृत्स्नः; पापोदय़ो निरय़ोऽभावसंस्थः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
सर्वगः सर्वभूतात्मा सर्वभूतभवोद्भवः |
१८६ क