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विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
क्षिप्रं वलचतुर्भागं गृह्य गच्छ पुरं प्रति |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
क्षिप्रं वा सन्धिकामः स्यात्क्षिप्रं वा तीक्ष्णविक्रमः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति; विज्ञाय़ चार्थं भजते न कामात् |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं शरैः षड्भिरमित्रसाह; श्चकर्त खड्गं निशितैः सुधारैः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
तुलाधार उवाच
क्षिप्रं शिरस्यजाय़न्त ते च सम्भावितास्त्वय़ा ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं श्येनस्य चरतो यथैवामिषगृद्धिनः |
१४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं श्येनाभिपन्नानां वाय़सानामिव स्वनः |
५५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं संनद्धकवचौ सखड्गावात्तकार्मुकौ |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय ९
सहदेव उवाच
क्षिप्रं हि गावो वहुला भवन्ति; न तासु रोगो भवतीह कश्चित् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं ह्यभिमुखः सङ्क्ये विसञ्ज्ञो विमुखीकृतः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रकारिन्यथा त्वेतत्कार्यं समुपपद्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
क्षिप्रकारी जितक्रोधः सुप्रसादो महामनाः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
क्षिप्रमङ्गानि लिम्पस्व पाय़सेनेति स स्म ह ||
२१ ग
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रमन्तर्दधे शौरिश्चक्षुषां प्रिय़दर्शनः ||
२२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
क्षिप्रमन्वागमिष्यामि तत्र मां प्रतिपालय़ ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४
उपश्रुतिरु उवाच
क्षिप्रमन्वेहि भद्रं ते द्रक्ष्यसे सुरसत्तमम् ||
४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रमभ्यपतत्कर्णः परीप्संस्तनय़ं तव ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रमस्त्रं समादाय़ द्रोणानीकं विशातय़ ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
क्षिप्रमागच्छ भद्रं ते त्वं मे प्राणसमः सखा |
७६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रमागमनं मह्यं तस्मै त्वं वेदय़स्व ह ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
क्षिप्रमाचक्ष्व मे व्रह्मञ्श्रेय़ो यदिह मन्यसे ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रमानीय़तां सर्वं तीर्थहेतोः परिच्छदम् ||
१६ ग
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रमानय़ गान्धारीं सर्वाश्च भरतस्त्रिय़ः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रमानय़ तं पापं राज्यलुव्धं सुय़ोधनम् ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
क्षिप्रमानय़ दुर्धर्षं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
क्षिप्रमारभते कर्तुं न विघ्नय़ति तादृशान् ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
क्षिप्रमारभसे कर्तुं न विघ्नय़सि तादृशान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रमुत्तरकालानि कुरु कार्याणि पाण्डव ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रमुत्तरकालानि कुरु कार्याणि पार्थिव ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रमुत्तरकालानि कुरु कार्याणि भारत ||
२२ ग
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
क्षिप्रमेनं परित्यज्य पुत्र शाम्यस्व पाण्डवैः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रमेव ततोऽगच्छत्पुरस्कृत्य जनार्दनम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
क्षिप्रमेव महाकाय़ं वृत्रं दैत्यमपातय़त् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रमेव महाप्राज्ञ गान्धारीं शमय़िष्यसि |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्यात्तथा भवान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
क्षिप्रमेवापय़ातोऽस्मादुभौ प्रथममध्यमौ ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सर्वशाखामृगैः सह |
६३ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सुग्रीवेणाभिरक्षितः |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
क्षिप्रहस्तं द्विजश्रेष्ठं कृतिनं चित्रय़ोधिनम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
क्षिप्रहस्तश्च वलवान्दृढधन्वारिमर्दनः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रहस्तश्चित्रय़ोधी मतः सेनापतिर्मम |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रास्त्रो न्यवधीद्व्रातान्मर्मज्ञो मर्मभेदिभिः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
क्षीणः शापः सुकृच्छ्रो मे त्वय़ा सम्भाष्य साधुना ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
क्षीणः सर्वार्थहीनश्च निर्वन्धुर्ज्ञातिवर्जितः |
५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
क्षीणकोशो निरातङ्कः प्राप्नोति परमं पदम् ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
क्षीणकोशो ह्यमावास्यां चन्द्रमा न प्रकाशते |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
क्षीणतोय़ानिलार्काभ्यां हतत्विडिव पद्मिनी |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
क्षीणदेहः पुनर्देही व्रह्मत्वमुपगच्छति ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
व्राह्मण उवाच
क्षीणदोषमहं मन्ये चाभितस्त्वां नरोत्तम ||
१३ ख