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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
नारद उवाच
सर्वत्र भगवान्वाय़ुश्चेष्टाप्राणकरः प्रभुः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
सर्वत्र रमते प्राज्ञः सर्वत्र च विरोचते |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
सर्वत्र विजय़ं चापि लभते मनुजाधिप ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्ग्यः सत्यफलं तपः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्ग्यः सत्यफलोदय़ः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
सर्वत्र वुद्धिः कथिता श्रेष्ठा ते भरतर्षभ |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
शल्य उवाच
सर्वत्र व्राह्मणाः सन्ति सन्ति सर्वत्र क्षत्रिय़ाः |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
सर्वत्र शूरा जाय़न्ते महासत्त्वा महावलाः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
कश्यप उवाच
सर्वत्र सर्वं पणतु न्यासलोपं करोतु च |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
कश्यप उवाच
सर्वत्र सर्वं पणतु न्यासे लोभं करोतु च |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
सर्वत्र सर्वदा कृष्णं तस्मादेवं प्रभाषते ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
सर्वत्र सुखसंस्पर्शा निष्पङ्का च जनाधिप ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
सर्वत्र सुखसंस्पर्शा निष्पङ्का नीरजा शुभा ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३४
श्रीभगवानु उवाच
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
युधिष्ठिर उवाच
सर्वथा कार्यदुर्गेऽस्मिन्भवान्नः परमो गुरुः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा कार्यमेतन्नः स्वधर्ममनुतिष्ठताम् |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा कुरवस्ते हि ये चान्ये वसुधाधिपाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्षस्वास्माननिन्दिते ||
११५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
सर्वथा क्षमिणा भाव्यं तथा सत्यपरेण च |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४८
नाग उवाच
सर्वथा चोक्तवान्वाक्यं नाकृतार्थः प्रय़ास्यति ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा तारय़ेत्पुत्रः पुत्र इत्युच्यते वुधैः ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सर्वथा तु तदालक्ष्य स्फुटेय़ुरपि पर्वताः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
सर्वथा तु मय़ा कार्यं धर्मराजस्य शासनम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा ते महावाहो गान्धार्याः क्रोधनाशनम् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा त्वं महावाहो देवैरपि दुरुत्सहः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
सर्वथा त्वत्क्षमं चैतद्रोचते च ममानघ |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
सर्वथा त्वां समासाद्य नाश्चर्यमिति मे मतिः ||
६४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
सर्वथा त्वेतदुचितं दुर्वलेषु वलीय़साम् |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा धनमाहार्यं यष्टव्यं चापि यत्नतः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा धर्मनित्यं तु पुरुषं धर्मदुर्वलम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा धर्ममूलोऽर्थो धर्मश्चार्थपरिग्रहः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा नार्यकर्मैतत्प्रशंसा स्वय़मात्मनः |
६ क
वन पर्व
अध्याय ४६
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वथा नास्ति मे पुत्रः सामात्यः सहवान्धवः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
सर्वथा परिहीनाः स्म तेजसा च वलेन च |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
सर्वथा पाण्डवान्सर्वाञ्जेष्याम्यद्य समागतान् ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
सर्वथा पार्थिवेनेह सततं भूतिमिच्छता |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
सर्वथा पाविताः स्मेह श्रुत्वेमामादितः कथाम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
सर्वथा पीडितो हि स्यादवध्यान्पीडय़न्रणे ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वथा पुत्र वलिभिर्विग्रहं ते न रोचय़े |
१० क
वन पर्व
अध्याय ९६
लोमश उवाच
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ९६
लोमश उवाच
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ९६
लोमश उवाच
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा भर्तृरहितं न ममेष्टं कथञ्चन ||
२८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
सर्वथा भागधेय़ानि स्वानि प्राप्नोति मानवः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
सर्वथा यतमानानामय़ुद्धमभिकाङ्क्षताम् |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
सर्वथा यत्पशून्पाति तैश्च यद्रमते पुनः |
८२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
सर्वथा यत्पशून्पाति तैश्च यद्रमते पुनः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
सर्वथा युद्धमेवाहमाशंसामि परैः सह |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
भीष्म उवाच
सर्वथा राजशार्दूल युक्तिः सर्वत्र पूज्यते ||
२५ ख