chevron_left  सर्वधर्मोपपन्नोऽय़ंarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
सर्वधर्मोपपन्नोऽय़ं मम शिष्यश्च पाण्डवः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वधातुविनद्धश्च शृङ्गवान्नाम पर्वतः ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
सर्वनिश्चय़वित्प्राज्ञः संशय़ं परिपृच्छते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
सर्वनीत्या सर्वगतं मनोहेतु सलक्षणम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वपन्नगराजानमभ्यषिञ्चन्यथाविधि |
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
सर्वपाञ्चालसेनाभिः संवृतो रथसत्तमः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभय़ापहम् ||
१०२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वपापप्रशमनं सिद्धक्षेत्रमनुत्तमम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा कुरुलोकं प्रपद्यते ||
१४४ ग
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेच्च परमां गतिम् ||
१०४ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ||
७१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
वासुदेव उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा मोक्षं प्राप्स्यसि केवलम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा याति व्रह्म सनातनम् ||
१३० ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा विन्द्याद्वहु सुवर्णकम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकमवाप्नुय़ात् ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा व्रह्मलोकं च गच्छति ||
१३२ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा व्रह्मलोकं प्रपद्यते ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा व्रह्मलोके महीय़ते ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा शक्रलोकं च गच्छति ||
१३८ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं व्रजेद्ध्रुवम् ||
७६ ग
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीय़ते ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीय़ते ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भरद्वाज उवाच
सर्वपापसमादानं नृशंसे चानृते च यत् |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वपापापहं सुभ्रु नाम्ना वदरपाचनम् |
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
सर्वपाप्मापहमिदं चतुर्वेदसमन्वितम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सर्वपारशवीं चैव शक्तिं शूरः सुदक्षिणः |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
सर्वपारशवीं तीक्ष्णां जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ||
९२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
सर्वपारशवीं तीक्ष्णां महोल्काप्रतिमां तदा ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
सर्वपारशवीं शक्तिं विससर्ज जिघांसय़ा ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
सर्वपारशवैर्वाणैः कर्मारपरिमार्जितैः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
सर्वपारशवैस्तूर्णमकुण्ठाग्रैर्महावलः ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वपारसवं वर्म कल्याणपटलं दृढम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
सर्वपार्थिववीराणां संनिधौ पूजय़न्निव ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
सर्वपार्श्वसुतस्तार्क्ष्यो धर्मसाधारणो वरः |
१३६ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
सर्वपूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः |
८४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वप्रकृतिसांनिध्यं कारय़ित्वा स्ववेश्मनि ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
सर्वप्रहरणीय़ानि सन्ति यानीह कानिचित् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वप्राणभृतां तत्र जननीमिव विष्ठिताम् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
सर्वप्राणभृतां धीरा महदुत्पद्यते भय़म् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
सर्वप्राणभृतां प्राणान्योऽन्तकाले निरस्यति |
४९ क
स्त्री पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वप्राणभृतां भावं स तत्र समवुध्यत ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
सर्वप्राणभृतां वृत्तं प्रेक्षमाणस्ततस्ततः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वप्राणभृतां श्रेष्ठं सर्वधर्मभृतां वरम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
सर्वप्राणिहितः प्रश्नः श्रूय़तां वुद्धिवर्धनः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
सर्वभक्षः कथं तेषां भविष्यामि मुखं त्वहम् ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
सर्वभक्षफलोपेतः स वै प्रेत्य सुखी भवेत् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८२
भृगुरु उवाच
सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
सर्वभक्षा न पश्यन्ति कर्मभूमिं विचेतसः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
सर्वभारसहं शश्वद्गन्धमाल्यार्चितं शरम् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
सर्वभावानतिक्रम्य लघुमात्रः परिव्रजेत् |
३८ क