chevron_left  आदित्येनेवांशुमताarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
आदित्येनेवांशुमता मन्दरश्चारुकन्दरः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
आदित्येऽस्तङ्गते श्रीमान्सन्ध्याकाल उपस्थिते ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
आदित्यैर्द्वादशैस्तस्य विमानं संविधीय़ते |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्यैर्हि तदा दैत्या वहुशो निर्जिता युधि |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
आदित्यो गिरते चन्द्रमादित्यं गिरते परः |
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ||
७३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४४
व्रह्मो उवाच
आदित्यो ज्योतिषामादिरग्निर्भूतादिरिष्यते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १८३
सनत्कुमार उवाच
आदित्यो दिवि देवेषु तमो नुदति तेजसा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
आदित्यो नावतपिता कदाचिन्मध्यतः स्थितः ||
३४ ख
मौसल पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्यो रजसा राजन्समवच्छन्नमण्डलः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
आदित्यो वरुणो विष्णुर्व्रह्मा सोमो हुताशनः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनः पुनरुदेति च ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
आदित्योदय़ने प्राप्ते विधिमन्त्रपुरस्कृतम् |
६० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्योदय़वर्णस्य धुरं रथवरस्य तु |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
आदित्योऽय़ं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरुत मा भय़म् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
आदिदाय़ाः सिरालाश्च स्तूवका स्तनपास्तथा ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
मार्कण्डेय़ उवाच
आदिदेवमजं विष्णुं पुरुषं पीतवाससम् ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
आदिदेवसमुद्भूता व्रह्ममूलाक्षय़ाव्यया |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
आदिदेवो महाय़ोगी यत्रास्ते मधुसूदनः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
आदिदेश तदा सर्वान्विवुधान्भूतकृत्स्वय़म् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
आदिदेश नरव्याघ्रस्तनय़ं शत्रुकर्शनम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
आदिदेश महीपालस्तमेव सचिवं तदा ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
आदिदेश सवाहानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
आदिदेश सुधर्माणं धौम्यं सूतं च सञ्जय़म् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
आदिदैत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुस्त्वय़ा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
आदिनाथश्च लोकस्य तत्परं व्रह्म तद्ध्रुवम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
आदिपत्यं व्रजेन्मर्त्यो ज्येष्ठाय़ामपवर्जय़न् |
९ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
आदिपद्मालय़ो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
आदिमध्यावसानज्ञः प्रच्छन्नं च विचारय़ेत् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
आदिमध्यावसानानां ज्ञातारश्छिन्नसंशय़ाः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
आदिमध्यावसानान्तं सृज्यमानमचेतनम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
आदिराष्ट्राः सुकुट्टाश्च वलिराष्ट्रं च केवलम् |
४३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
आदिरेष हि भूतानां मध्यमन्तश्च भारत |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४०
व्रह्मो उवाच
आदिर्गुणानां सर्वेषां प्रथमः सर्ग उच्यते ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
आदिर्गुणानां सर्वेषां भवान्वै जीवनाश्रय़ः |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४४
व्रह्मो उवाच
आदिर्विश्वस्य जगतो विष्णुर्व्रह्ममय़ो महान् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
आदिश्य च स्वय़ं शक्रः सर्वानेव दिवौकसः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
आदिश्य विवुधान्सर्वानजाय़त यदुक्षय़े ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
आदिश्यतामभ्यधिको ममांशः पृथिवीपते |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
आदिश्यादिश्य तेजस्वी शिरांस्येषां न्यपातय़त् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
आदिश्यादिश्य दुर्गस्थान्पातय़ामास राक्षसान् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
आदिश्यादिश्य नाराचैराजघान वृकोदरः ||
३५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
आदिश्यादिश्य विप्रेभ्यो ददौ स नृपसत्तमः ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वय़म् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
आदिष्टस्तु त्वय़ा राजन्को न युध्येत मादृशः |
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
आदिष्टिनो ये राजेन्द्र व्राह्मणा वेदपारगाः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
आदिष्टो न विकल्पेत स राजवसतिं वसेत् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
आदिस्त्वमसि लोकानां संहर्ता काल एव च ||
१६१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
आदीप्तं तव तत्सैन्यं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् |
३२ क