chevron_left  सर्वरत्नमय़ैर्भान्तिarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
सर्वरत्नमय़ैर्भान्ति शृङ्गैश्चारुभिरुच्छ्रितैः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
सर्वरत्नमय़ैश्चित्रैरवगाढा नगोत्तमैः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
सर्वरत्नविचित्रा च भूमिः पुष्पविभूषिता ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वरत्नसमाकीर्णाः सभाश्चक्रुरनेकशः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वरत्नसमाकीर्णे पुंसां देशे मनोरमे |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वरत्नसमृद्धा च मही वसुमती तदा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
सर्वरत्नानि राजा च यथार्हं प्रतिपादय़ेत् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
सर्वरत्नान्युपादाय़ पार्थिवा वै जनेश्वर ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
मातलिरु उवाच
सर्वरत्नैः समुदितं दुर्धर्षममरैरपि |
८ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वराक्षसराज्ये चाप्यभ्यषिञ्चद्विभीषणम् |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
सर्वराक्षससत्राय़ सम्भृतं पावकं मुनिः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वराजसु विख्याता रूपेणासदृशी भुवि |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वरात्रिविहारोऽद्य रत्नाभरणलक्षणः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
सर्वरूपं भवं ज्ञात्वा लिङ्गे योऽर्चय़ति प्रभुम् |
८७ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वर्तुकुसुमैः पुण्यैः पादपैरुपशोभिताम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
सर्वर्तुकुसुमैर्युक्तान्स्निग्धपत्रान्सुशाखिनः |
१९९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वर्तुकुसुमैर्वृक्षैरतीव सुखशाद्वलम् |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
सर्वर्तुकुसुमोपेताः पुष्पवन्तो महाद्रुमाः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
सर्वर्तुकैराम्रवनैः पुष्पितैरुपशोभितम् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम् |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वर्तुगुणसम्पन्नाञ्शिल्पिनोऽथ सहस्रशः ||
४७ ग
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं गन्धमादनसानुषु ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वर्तुफलपुष्पेषु मानसेषु सरःसु च |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वर्तुफलभाराढ्यान्सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वलान् |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
सर्वर्तुभिर्मूलफलैः पक्षिभिश्च समन्वितम् |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वर्तुरमणीय़ेषु गन्धमादनसानुषु |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
सर्वर्द्धिगुणसम्पन्नास्ते चापि निधनं गताः ||
१८२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जय़ः ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वलक्षणसम्पन्नं त्रैलोक्यस्यापि सुप्रिय़म् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
सर्वलक्षणसम्पन्नं निपुणं श्रुतिसागरम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलक्षणसम्पन्नं महाभुजगवर्चसम् |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलक्षणसम्पन्ना नाशं नार्हन्ति पाण्डवाः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलक्षणसम्पन्ना वैडूर्यमणिसंनिभा |
९७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
सर्वलक्षणसम्पन्नां व्रह्मस्त्वं मां प्रभाषसे |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलक्षणसम्पन्नां सुरसां च यशस्विनीम् ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
सर्वलक्षणहीनोऽपि समुदाचारवान्नरः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
सर्वलोकं समं शक्तः सान्त्वेन कुरुते वशे |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलोकः समावृत्तः पिप्रीषुः फलमुत्तमम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलोकक्षय़ो मा भूत्सम्पादय़तु नोऽनलम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
सर्वलोकगुरुर्येषां त्वं नाथो मधुसूदन ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
सर्वलोकचरं सिद्धं व्रह्मकोशं सनातनम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
सर्वलोकतमोहन्ता आदित्यो द्वारमुच्यते ||
१३ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलोकप्रमोहार्थं तदस्त्रं प्रमुमोच ह ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
सर्वलोकमहेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८५
वृहस्पतिरु उवाच
सर्वलोकमिमं शक्र सान्त्वेन कुरुते वशे ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
द्रौपद्यु उवाच
सर्वलोकमिमं हन्युर्धर्मपाशसितास्तु ये |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
सर्वलोकमय़ो नित्यः शास्ता धाता धरो ध्रुवः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
सर्वलोकविनाशाय़ तपसा महतैधितः ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलोकविनाशाय़ दैवेनोपनिपीडिताः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १७१
और्व उवाच
सर्वलोकविनाशाय़ न सा मे वितथा भवेत् ||
१ ख