chevron_left  सर्वलोकविनाशाय़arrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १६९
गन्धर्व उवाच
सर्वलोकविनाशाय़ मतिं चक्रे महामनाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
सर्वलोकस्य कर्माणि कर्तव्यानीह पार्थिव ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
सर्वलोकस्य कौन्तेय़ राजा भवति सोऽऽश्रमी ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
सर्वलोकस्य तत्त्वज्ञः सर्वलोकगुरुः प्रभुः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वलोकस्य विदिता युगसङ्ख्या च पाण्डव |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलोकस्य सांनिध्ये ग्रामांस्त्वं पञ्च याचितः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
सर्वलोकहितं धर्मं क्षत्रिय़ेषु प्रतिष्ठितम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
सर्वलोकागमं कृत्वा मृदुत्वं गन्तुमेव च |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलोकात्परं मत्वा जगाम मनसा हरिम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलोकादभिक्रुद्धान्न भय़ं विद्यते मम ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
सर्वलोकेश्वरं वाक्यं प्रणम्यैनमथाव्रुवन् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वलोकेश्वरस्येव परमेष्ठिप्रजापतेः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
सर्वलोकेश्वराः शूरास्तत्र तत्र विशां पते |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
सर्वलोकेषु विख्यातैः स्थाणुं स्तोष्यामि नामभिः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वलोकेषु विख्यातो न पुत्रपशुसंहितः ||
६ ग
विराट पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
सर्वलोकेषु विख्यातो भारद्वाजः प्रतापवान् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
सर्वलोकेष्वतिवलः स्वय़ं द्रक्ष्यति मागधः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
सर्वलोको ह्ययं मन्ये वुद्ध्या परिगतस्त्वय़ा |
१०६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
सर्ववर्णप्रिय़करः सर्वभूतहितः सदा |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
सर्ववर्णा महाराज जाय़न्ते द्वापरे सति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
सर्ववर्णेषु यत्तेषु नासीत्कश्चिद्व्यतिक्रमः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
सर्ववर्णैः सदा रक्ष्यं व्रह्मस्वं व्राह्मणास्तथा |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
युधिष्ठिर उवाच
सर्ववर्णैस्तु यच्छक्यं प्रदातुं फलकाङ्क्षिभिः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्ववादित्रनादैश्च समलञ्चक्रिरे ततः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्ववानरगोपुच्छा यमृक्षाश्च भजन्ति वै ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
सर्ववानरराजानौ सर्ववानरय़ूथपाः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
सर्वविघ्नान्प्रशमय़न्महादेवस्य धीमतः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
सर्ववित्सर्वजित्सिद्धो भव भावविवर्जितः ||
५८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
सर्ववित्सर्वभूतेषु वीक्षत्यात्मानमात्मनि |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
सर्वविद्यस्तु चक्षुष्मानपि यादृशतादृशः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
सर्वविद्यातिरेकाद्वा जय़मिच्छेन्महीपतिः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
सर्वविद्यान्तगं श्रेष्ठं धनुर्वेदे च पारगम् |
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वविद्यासु निष्णाता वेदवेदाङ्गपारगाः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
सर्ववीजविरूढेव यथा सीता श्रिय़ा वृता ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्ववृत्तान्ततत्त्वज्ञो भवान्दिव्येन चक्षुषा |
४ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
सर्ववृष्णिप्रवीरांश्च हर्षय़न्नव्रुवं तदा ||
७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
सर्ववेदविदां श्रेष्ठो व्यासः सत्यवतीसुतः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
सर्ववेदाधिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
सर्ववेदेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो व्रह्मलोके महीय़ते ||
४६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
उमो उवाच
सर्वव्यापी तु यो धर्मो भगवंस्तं व्रवीहि मे ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
युधिष्ठिर उवाच
सर्वव्यापी महातेजा दण्डः श्रेय़ानिति प्रभो ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वशः कौरवाश्चैव प्राणदन्भृशदुःखिताः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
सर्वशव्दातिगः सङ्ख्ये कृतकर्मा जितक्लमः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
सर्वशव्दानतिक्रम्य पूरय़ामास रोदसी ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं कथं जेष्यसि पाण्डवम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
सूर्य उवाच
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं कन्या चैव भविष्यसि ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं मेरुं शिखरिणामिव |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं रोचमानमिवातिथिम् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
सर्वशस्त्राणि चादत्स्व योजय़स्व च वाहिनीम् |
२४ क