chevron_left  सर्वशस्त्रातिगौarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वशस्त्रातिगौ सेनां प्रविष्टौ रथसत्तमौ |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वशस्त्रास्त्रकुशलः क्षत्रिय़ान्तकरो वशी ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
सर्वशस्त्रास्त्रकुशलास्ते रक्षन्तु पितामहम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
सर्वशस्त्रास्त्रमोक्षेण पौरुषे समवस्थिताः |
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
सर्वशस्त्रेषु कुशलाः सत्त्ववन्तो ह्युशीनराः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वशस्त्रैरनाधृष्यं सर्वशस्त्रप्रमाथि च |
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वशस्त्रोपपन्नेन जीमूतरवनादिना |
४ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वशाखामृगेन्द्रेण सुग्रीवेणाभिपालितौ ||
६१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वशास्त्रप्रणेतारः कुशला यज्ञकर्मसु ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
युधिष्ठिर उवाच
सर्वशास्त्रविधानज्ञ राजधर्मार्थवित्तम |
१ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
सर्वशास्त्रातिगो मूढः शं जन्मसु न विन्दति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सहिष्णुं देशजं तथा ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वशिल्पविदश्चैव वासाय़ाभ्यागमंस्तदा ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
सर्वशिल्पादिनिधय़ो निपुणाः सूक्ष्मदर्शिनः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
सर्वशैक्यां चतुष्किष्कुं गुर्वीं रुक्माङ्गदां गदाम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वशो हि वधः श्रेय़ान्प्रेत्य लोकाँल्लभेमहि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
सर्वशौचेषु व्राह्मेण तीर्थेन समुपस्पृशेत् |
१०४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
सर्वश्चैव गणो देव क्षेत्रज्ञे ते निवेशितः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वश्वेतेव माहेय़ी वने जाता त्रिहाय़नी |
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
सर्वसंन्यासधर्माणां तत्त्वज्ञानविनिश्चय़े |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वसंशय़निर्मोक्ता नारदः सर्वलोकवित् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वसंहननोपेतं सर्वलक्षणलक्षितम् |
६८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
सर्वसङ्करपापेभ्यो देवतास्तवनन्दकः ||
२९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
सर्वसङ्क्षेपको दण्डः पितामहसमः प्रभुः ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
सर्वसङ्गविनिर्मुक्तं छन्दांस्युत्तारय़न्त्युत ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
सर्वसङ्गान्परित्यज्य निश्चितां मनसो गतिम् ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
सर्वसङ्ग्रहणे युक्तो नृपो भवति यः सदा |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
सर्वसत्त्वसमाकीर्णं नरकं स न पश्यति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
सर्वसत्त्वाः समीपस्था भवन्ति वनचारिणः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
सर्वसम्पत्प्रधानं यद्वाहुल्यं वापि सम्भवेत् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
सर्वसस्यप्रतिच्छन्ना पृथिवी फलमालिनी |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
सर्वसात्वतमुख्यानां द्वारकाय़ाश्च सत्तम |
९२ ख
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
सर्वसामर्थ्यलिप्सूनां पापो भवति निश्चय़ः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
सर्वसामान्यतो विद्वान्कृतकृत्यः सुखं स्वपे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
सर्वसाम्यमनाय़ासः सत्यवाक्यं च भारत |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वसेनापतिं चात्र धृष्टद्युम्नमुपादिशत् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८
दुर्योधन उवाच
सर्वसेनाप्रणेता मे भवान्भवितुमर्हति ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वसेनाप्रणेतॄणां मध्ये वाक्यमुवाच ह ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
सर्वसैन्यानि चाक्षुद्राः प्रहृष्टाः प्रत्यपूजय़न् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
सर्वसैन्यानि पाण्डूनां न्यस्तशस्त्राण्यचेतसः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सर्वसैन्यानि भीतानि व्यवलीय़न्त भारत ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
सर्वसैन्यानि राजा च धृतराष्ट्रोऽत्ययं गतः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
सर्वसैन्यानि सङ्क्रुद्धो वारय़ामास भारत ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
सर्वस्तवानां दिव्यानां राजत्वे समकल्पय़त् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
सर्वस्त्वमसि देवानां कर्ता कारय़िता च ह |
४६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
सर्वस्त्वमसि लोकानां कर्ता कारय़िता च ह |
१११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
सर्वस्नेहावसानं तदिदं तत्प्रेतपत्तनम् ||
६७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०१
सुन्दोपसुन्दावू ऊचतुः
सर्वस्मान्नौ भय़ं न स्यादृतेऽन्योन्यं पितामह ||
२३ ख