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अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
सर्वाणि चैव भूतानि स्थावराणि चराणि च |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाणि तानि दृष्टानि पुनः पुनररिन्दम ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २६
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वाणि भूतानि नरेन्द्र पश्य; यथा यथावद्विहितं विधात्रा |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
सर्वाणि भूतानि भृशं विनेदुः; क्षय़ं कुरूणामिति चिन्तय़ित्वा ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
सर्वाणि भूतानि सुखे रमन्ते; सर्वाणि दुःखस्य भृशं त्रसन्ति |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाणि युय़ुधानेऽस्मिन्नित्यानि पुरुषर्षभे ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
सर्वाणि येषां गाङ्गेय़ैस्तोय़ैः कृत्यानि देहिनाम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाणि विप्रैरुपशोभितानि; क्वचित्क्वचिद्भारत सागरस्य ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
सर्वाणि सैन्यानि च वासुदेवः; प्रधक्ष्यते साय़कवह्निजालैः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
सर्वाणि सैन्यानि ततः प्रहृष्टो; निर्गच्छतेत्याह नृपांश्च सर्वान् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
सर्वाणि सैन्यानि तु तावकानि; यतो यतो गाण्डिवजः प्रणादः |
११६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
सर्वाणीन्द्रिय़कर्माणि प्राणकर्माणि चापरे |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १२५
लोमश उवाच
सर्वाण्यनुपरिक्रम्य यथाकाममुपस्पृश ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सर्वाण्यपरिमेय़ानि तदेषां रूपमैश्वरम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
सर्वाण्यपि च सैन्यानि भारद्वाजोऽत्यरोचत ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
सर्वाण्यशून्यानि करोत्यनन्तः; सनत्कुमारः सञ्चरते च लोकान् |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
सर्वाण्यस्त्राणि धर्मात्मा हातुकामोऽभ्यभाषत |
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
सर्वाण्यस्थीनि सहसा प्रापतन्वै पृथक्पृथक् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तत्र परिग्रहः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
सर्वाण्येतानि कौन्तेय़ विद्यन्ते मनुजर्षभ |
४ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वाण्येतानि जीवानि तत्र किं प्रतिभाति ते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
वृहस्पतिरु उवाच
सर्वाण्येतानि धर्मस्य पृथग्द्वाराणि सर्वशः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
सर्वाण्येतानि धर्माणि क्षात्रे भरतसत्तम |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
अध्वर्युरु उवाच
सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
सर्वाण्येतानि रूपाणि जानीहि प्राकृतानि वै ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
सर्वाण्येतानि संवार्य द्वाराणि मनसि स्थितः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
सर्वाण्येतानि सन्धाय़ मनसा सम्प्रधारय़ेत् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
सर्वाण्येतान्यकार्याणि प्राहुर्धर्मविदो जनाः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
सर्वाण्येव यथान्याय़ं यथापूर्वमरिन्दम ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाण्येवानुपूर्व्येण जगामामितविक्रमः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
सर्वाण्येवानुपूर्व्येण यद्यन्नानुविधीय़ते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
सर्वाण्येवान्नपानानि भक्ष्याश्चोच्चावचास्तथा |
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
सर्वाण्येवापिधीय़न्ते पदजातानि कौञ्जरे |
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
सर्वाण्येवापिधीय़न्ते पदजातानि कौञ्जरे ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
सर्वातिथ्यं च कर्तव्यमन्नेनोञ्छार्जितेन वै ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य कुर्वाणः सुमनाः सदा |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति दिवानिशम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति यथार्हतः |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
सर्वातिथ्यमुपातिष्ठञ्शेषान्नकृतभोजनः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वातिशङ्किनश्चैव संवृत्ताः क्लेशभागिनः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
सर्वातिशङ्की नृपतिर्यश्च सर्वहरो भवेत् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५८
भीष्म उवाच
सर्वातिशङ्की परुषो वालिशः कृपणस्तथा |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
सर्वातिशङ्की मानी च ततोऽस्मानतिशङ्कसे ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
सर्वात्मना कुरुश्रेष्ठस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
सर्वात्मना गुणैर्व्याप्य क्षेत्रज्ञः स युधिष्ठिर ||
८९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
सर्वात्मना च कर्तास्मि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ||
५६ ख