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वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
सर्वान्कुशलिनो दृष्ट्वा वान्धवान्दारकौ च तौ |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वान्कुशलिनो वीरान्पूजितान्द्रुपदेन च |
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
सर्वान्देवान्नमस्यन्ति ये चैकं देवमाश्रिताः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
सर्वान्देवान्नमस्यन्ति सर्वान्धर्मांश्च शृण्वते |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
सर्वान्द्रोणोऽजय़द्युद्धे कुरुभिः परिवारितः ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
सर्वान्नः सुहृदस्तात व्राह्मणाः सुमनोमुखाः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
व्राह्मण उवाच
सर्वान्नानात्वय़ुक्तांश्च सर्वान्प्रत्यक्षहेतुकान् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
अर्जुन उवाच
सर्वान्नुदामि ते शत्रून्रणे रणविशारद ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
सर्वान्नृपांश्चाप्यजय़ं देवराडिव दानवान् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
सर्वान्नो द्विषतस्तात व्राह्मणा जातमन्यवः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
सर्वान्प्रजापतीन्पश्य पश्य सप्त ऋषीनपि |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वान्भ्रातॄन्समानीय़ वासुदेवं च सात्वतम् |
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वान्महीपान्सहितान्कुरूंश्च; तथैव देवासुरय़क्षनागान् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वान्म्लेच्छगणांश्चैव विजिग्ये भरतर्षभः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
सर्वान्यक्षगणांस्तात शापस्यान्तचिकीर्षय़ा ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
सर्वान्योधांस्तृणीकृत्य विजिग्ये पुरुषर्षभः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
सर्वान्योधान्वारितानर्जुनेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३७ ख
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
सर्वान्राज्ञः सहागस्त्यान्निमेषादिव भारत ||
१५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वान्वदेः सञ्जय़ स्वस्तिमन्तः; कृच्छ्रं वासमतदर्हा निरुष्य |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वान्वस्तात शोचामि त्यक्तो दुर्योधनो मय़ा |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
सर्वान्विक्रम्य मिषतो लोकांश्चाक्रम्य मूर्धनि |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
सर्वान्विसर्जय़ामास देवानृषिगणांश्च तान् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वान्विसर्जय़ामास ये तेनाभ्यागताः सह |
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
शक्र उवाच
सर्वान्वेदानधीय़ीत पुण्यशीलोऽस्तु धार्मिकः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
सर्वान्वेदानधीय़ीत शुश्रूषुर्व्रह्मचर्यवान् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
सर्वान्सङ्ख्ये शत्रुसङ्घान्निहत्य; दास्याम्यहं धार्तराष्ट्राय़ राज्यम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
सर्वान्सङ्ख्ये शत्रुसङ्घान्हनिष्ये; हतस्तैर्वा वीरलोकं गमिष्ये ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वान्सन्तोषय़ामास संश्रितान्ददतां वरः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३०
गरुड उवाच
सर्वान्सम्पिण्डितान्वापि लोकान्सस्थाणुजङ्गमान् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
सर्वान्सम्पूज्य शिरसा राजानं सोऽव्रवीद्वचः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वान्सर्वात्मना तात नेतुकामो यमक्षय़म् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
सर्वान्सुपरिणीतांस्तान्कारय़ेत युधिष्ठिर ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
सर्वान्सुपरिणीतेन कर्मणा तोषय़ाम्यहम् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
सर्वान्स्विष्टकृतो देवान्विद्याद्य इह कश्चन |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १४०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाभरणसंय़ुक्तं सुसूक्ष्माम्वरवाससम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
सर्वाभरणसम्पन्ना परमाम्वरधारिणी |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
सर्वाभिशङ्की मूढश्च वालः कटुकवागपि |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
यय़ातिरु उवाच
सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय़; प्रस्थे वद्ध्वा ह्यददं व्राह्मणेभ्यः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
सर्वामिमां यः पृथिवीं सहेत; तथा विद्वान्योत्स्यमानोऽस्मि तेन ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
सर्वामेव सिद्धिं प्राप्स्यसि |
९२ 6
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
सर्वाम्भोनिलय़ं भीममूर्मिमन्तं झषाय़ुतम् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३४
श्रीभगवानु उवाच
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रिय़ः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
सर्वारम्भफलत्यागी निराशीर्निष्परिग्रहः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
सर्वारम्भा हि विदुषां तात धर्मार्थकारणात् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वारम्भाः सुप्रवृत्ता गोरक्षं कर्षणं वणिक् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वारम्भान्समुत्सृज्य हतस्वस्तिरकिञ्चनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वार्थचिन्तका लोके यथाधीकारनिर्मिताः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
सर्वार्थत्यागिनं राजा कुले जातं वहुश्रुतम् |
२७ क