chevron_left  धर्मतोarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
धर्मतो याचमानानां शमार्थं च कुलस्य नः |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
धर्मतो हि शुश्रूषितोऽस्मि भवता |
९२ ग
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मतोऽहं परित्याज्या युवय़ोर्नात्र संशय़ः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
धर्मत्राणं पुण्यमेषां कृतं स्या; दार्ये वृत्ते भीमसेनं निगृह्य ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
धर्मदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासकः |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मदृष्टैर्विधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वय़म् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
धर्मद्वारं ममैतत्स्यान्निय़ोगकरणं तव ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
धर्मद्वीपेन भूतानां चार्थकामरवेण च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
धर्मद्वय़ं हि यो वेद स सर्वः सर्वधर्मविद् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
धर्मध्वजवता पापं कृतं तद्विदितं मम |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतिः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
धर्मनिःश्रेणिमास्थाय़ किञ्चित्किञ्चित्समारुह |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
धर्मनित्यं स्थितं स्थित्यां मन्त्रिणं पूजय़ेन्नृपः ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
धर्मनित्यः प्रशान्तात्मा कार्ययोगवहः सदा |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मनित्यः शुचिर्दान्तो न्यस्तदण्डो महातपाः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १३०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मनित्यः सदा पाण्डुर्ममासीत्प्रिय़कृद्धितः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मनित्यस्ततो राजन्धर्मे च परमं गतः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मनित्यस्य च तदा गतदोषस्य धीमतः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मनित्याः प्रजाश्चासन्रामे राज्यं प्रशासति ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
धर्मनित्ये महावुद्धौ व्रह्मण्ये सत्यवादिनि |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४१
भीष्म उवाच
धर्मनित्यो जितक्रोधो नित्यतृप्तो जितेन्द्रिय़ः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
धर्मनित्यो मनीषिभ्यः स्वर्गलोके महीय़ते ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
धर्मनिर्धूतपापानां संसिध्यन्ते मनोरथाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
धर्मनिश्चय़संय़ुक्तां कामार्थसहितां कथाम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
धर्मनिष्ठां यदा वेत्ति तदा शाम्यति सा कृपा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
धर्मनिष्ठाञ्श्रुतवतो वेदव्रतसमाहितान् |
३ क
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मपत्नीं समाहूय़ पुत्रांश्चेदमुवाच ह ||
२ ग
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मपत्नीमभिरतां त्वय़ि राजीवलोचन ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
धर्मपत्नीरतो नित्यमग्निष्टोमफलं लभेत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
धर्मपालोऽक्षरो देवः सत्यगो नित्यगो ग्रहः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
सत्यवानु उवाच
धर्मपाशनिवद्धानामल्पो व्यपचरिष्यति ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
धर्मपाशनिवद्धास्तु न चेलुः क्षत्रिय़व्रतात् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
कर्ण उवाच
धर्मपाशनिवद्धेन यदि ते मर्षितं पुरा |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ५५
अर्जुन उवाच
धर्मपाशनिवद्धेन यन्मय़ा मर्षितं पुरा |
५ क
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मपाशपरिक्षिप्तानशक्तानिव विक्रमे ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मपाशसितस्त्वेवं नाधिगच्छामि सङ्कटम् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
धर्मपुत्र विषादं त्वं मा कृथाः सत्यसङ्गर |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मपुत्रं च भीमं च फल्गुनं नकुलं तथा |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २०
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मपुत्रः कथं चक्रे तस्मिन्वा नृपतिः कथम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
धर्मपुत्रः कथं राजा भविष्यति मृतेऽर्जुने |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मपुत्रः स पितरं परिष्वज्य महाभुजः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
जनमेजय़ उवाच
धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मपुत्रमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽव्रवीत् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मपुत्रे हि धर्मज्ञे कृतज्ञे सत्यवादिनि |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मप्रतिष्ठाहेतोश्च मनुं स्वारोचिषं ततः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
धर्मप्रत्यय उत्पन्नो यथाधर्मः कृतात्मभिः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
धर्मप्रधानः कार्याणि कुर्याश्चेति पुनः पुनः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
धर्मप्रधानानभिपाति धर्म; इत्यव्रुवन्धर्मविदः सदैव |
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
कुण्डधार उवाच
धर्मप्रधानो भवतु ममैषोऽनुग्रहो मतः ||
२५ ख