शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
सर्वे समरमासाद्य न श्रूय़न्ते पराजिताः ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वे समेत्य राजानमभ्यषिञ्चद्दशाननम् ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
दुर्योधन उवाच
सर्वे सम्पूजय़ामासुस्तद्वचो विजिगीषवः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४६
भीष्म उवाच
सर्वे सम्भूय़ सहितास्तस्य नागस्य वान्धवाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
सर्वे सम्भ्रान्तमनसः शरचापधराः स्थिताः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपराय़णाः ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसो देवैरपि सुदुर्जय़ाः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
सर्वे सर्वास्वपत्यानि जनय़न्ति यदा नराः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
सर्वे सर्वेषु भूतेषु यथावत्प्रतिपेदिरे ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
सर्वे सुकृतमिच्छन्तः सुय़ुद्धेनातिमन्यवः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सर्वे सुनिश्चिता योद्धुमुदग्रमनसोऽभवन् ||
४७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे सुमनसः प्रीता वभूवुः स च पार्थिवः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
सर्वे सुमनसस्तात शाम्याम भरतर्षभ ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वे स्कन्दग्रहा नाम ज्ञेय़ा नित्यं शरीरिभिः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे स्म तुल्यजातीय़ा यथा देवास्तथा वय़म् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे स्म ते संशय़िताः पुनरेव जनार्दन |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
दुर्योधन उवाच
सर्वे स्म समजातीय़ाः सर्वे मानुषय़ोनय़ः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
सर्वे स्वभावतः सृष्टा न क्रिय़ाभ्यो न कारणात् ||
११ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे स्वर्गमनुप्राप्तास्तान्पश्य पुरुषर्षभ ||
१६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
सर्वे स्वविषय़े श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यरक्षिणः ||
२२ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
सर्वे स्वाध्याय़वन्तो हि सर्वे च चरितव्रताः |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
सर्वे हि तेऽव्रुवन्धर्मं यथोक्तं वेदपारगैः ||
५१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे हि भस्मसान्नीता द्रोणेनैकेन संय़ुगे |
३३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
सर्वे हि युक्तिं विज्ञाय़ प्रज्ञां चापि स्वकां नराः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
सर्वे हि लोकास्तत्रस्थास्तथा देवाः सहर्षिभिः |
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
सर्वे हि वय़मेते च तवैव प्रसवः प्रभो |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे हि सर्वतो वीरास्तद्वचः प्रत्यपूजय़न् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
सर्वे ही व्यसनं प्राप्ताः सर्वे युद्धाभिनन्दिनः ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे हीमे कौरवेय़ाः सभाय़ां; दुःखान्तरे वर्तमानास्तवैव |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वे ह्यतिरथाः शूराः कीर्तिमन्तः प्रतापिनः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे ह्यनुसृता मोहात्पार्थिवाः सह मन्त्रिभिः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सर्वे ह्यपि न मे दुःखं कुर्युरन्ये नराधिपाः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे ह्यभिमुखाः शूरा विगता रणशोभिनः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वे ह्यस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महद्यशः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे ह्यस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महद्यशः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
सर्वे ह्यासन्निरुत्साहाः क्षत्रिय़ा दीनचेतसः |
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
सर्वे ह्येते न पर्याप्तास्तव वेगनिवारणे ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
सर्वे ह्येते श्रिय़ा युक्ताः सर्वे श्रीवत्सलक्षणाः |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वे ह्येतेऽनुमान्या मे कुलस्यास्य हितैषिणः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
सर्वेण खलु मर्तव्यं मर्त्यलोके प्रसूय़ता |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सर्वेणावश्यमर्तव्यं जातेन सरितां वरे ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
सर्वेन्द्रिय़गुणाभासं सर्वेन्द्रिय़विवर्जितम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वेन्द्रिय़ाण्यप्रकृतिं गतानि; किं वक्ष्यतीत्येव हि मेऽद्य चिन्ता ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
सर्वेभ्य एवाभ्यधिको रसोऽय़ं; मतो ममाद्याहितलोहितस्य ||
७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
सर्वेषां कर्मणां तात फले नित्यमनित्यता ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषां कुरुवृद्धानां महानय़मतिक्रमः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
सर्वेषां कृतवैराणामविश्वासः सुखावहः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
सर्वेषां क्षुद्रवृक्षाणां चैत्यवृक्षान्विवर्जय़ेत् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भरद्वाज उवाच
सर्वेषां खलु वर्णानां दृश्यते वर्णसङ्करः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वेषां च कृतः कालो मासेनागमनं पुनः ||
१७ ख