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उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
स तं सत्कृत्य कौरव्यः प्रेषय़ामास पाण्डवान् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
स तं सम्पूज्य तेजस्वी मुनिं पृथुललोचनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
स तं सम्पूज्य पलितं मार्जारः सौहृदे स्थितः |
७५ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
स तच्छरीरं सन्त्यज्य प्रविवेश धरां तदा |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
स तच्छिरो वेगवता शरेण; सुवर्णपुङ्खेन शिलाशितेन |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तच्छ्रुत्वा आरुणिरुपाध्याय़वाक्यं तस्मात्केदारखण्डात्सहसोत्थाय़ तमुपाध्याय़मुपतस्थे |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
स तच्छ्रुत्वा तु नृपतिरभिषेकनिवारणम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
स तच्छ्रुत्वा तु सङ्क्रुद्धः सर्वय़क्षगणाधिपः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय २५
सूत उवाच
स तच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं भीमवेगोऽन्तरिक्षगः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
स तच्छ्रुत्वा वचो घोरं राजा मुनिमुखोद्गतम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
स तच्छ्रुत्वा व्राह्मणानां सकाशा; द्व्रह्मोद्यं वै कथय़ितुमागतोऽस्मि |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
स तच्छ्रुत्वाकरोद्दर्पमृषींश्चैवावमन्यत ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
स ततः पुरुषव्याघ्रः सात्यकिः सत्यविक्रमः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
स ततार तय़ा नावा समुद्रं मनुजेश्वर |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
स ततो व्राह्मणो भूत्वा प्रह्रादं पाकशासनः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
स तत्कर्म प्रतिशुश्राव दुष्कर; मैश्वर्यवान्सिद्धिषु वासुदेवः ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्कर्म महत्कृत्वा शूरो माद्रवतीसुतः |
२३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्कुणपदुर्गन्धमशिवं रोमहर्षणम् |
२२ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्कृत्वा प्राप्तकालं वाष्पेणापिहितोऽर्जुनः |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
वृहस्पतिरु उवाच
स तत्पापं नुदते पुण्यशीलो; वासो यथा मलिनं क्षारय़ुक्त्या ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्प्रविश्याशिवमुग्ररूपं; ददर्श पुत्रान्सुहृदः सखींश्च |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
स तत्र काञ्चनं दिव्यं सर्वरत्नमय़ं गृहम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
स तत्र गच्छ कौन्तेय़ यत्र यातो धनञ्जय़ः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स तत्र गत्वा तस्याह्वानाय़ शव्दं चकार |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
स तत्र गत्वा शैनेय़ो जवेन जय़तां वरः |
९२ क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र च गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
स तत्र तत्राधिगतः सदैव; महाजनस्याधिपत्यं करोति ||
९५ ख
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः; क्रमेण संवर्धय़तीह गर्भम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र तामग्र्यधनुर्धरस्य; वेदीं ददर्शाय़तपीनवाहुः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र तामुषित्वैकां रजनीं पृथिवीपतिः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र नकुलो योद्धा चित्रय़ोधी व्यवस्थितः ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र नर्मसंय़ुक्तमकरोत्पाण्डवो वहु |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
स तत्र निक्षिप्य सुतं महर्षि; रुवाच सूर्याग्निसमप्रभावम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
स तत्र निवसन्राजा वैदर्भीमनुचिन्तय़न् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र निवसन्सर्वान्वशमानीय़ पार्थिवान् |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र पीत्वा पानीय़ं स्नात्वा च भरतर्षभ |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
स तत्र भगवान्देवः पुष्करे भासय़न्दिशः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
स तत्र मलदिग्धाङ्गं भरतं चीरवाससम् |
६१ क
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
स तत्र योधितो राजन्वालकैर्वृष्णिपुङ्गवैः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
स तत्र ववृधे मत्स्यः किञ्चित्कालमरिन्दम |
२० क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
स तत्र ववृधे राजन्मत्स्यः परमसत्कृतः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र ववृधे लोकानावृत्य ज्वलनात्मजः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
स तत्र वहुभिः शूरैः संनिरुद्धो महारथैः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
स तत्र वहुभिर्युक्तः सदा श्रुतिमय़ैर्गुणैः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
स तत्र वारितो द्वाःस्थैः प्रविशन्द्विजसत्तमः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र विधिना राजन्नाप्लुतः सुमहातपाः |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
स तत्र विधिवत्तेन पूजितः पाकशासनिः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
स तत्र विविधं हव्यं प्रतिगृह्य हुताशनः |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र विषय़ैर्युक्तः कल्याणैरतिमानुषैः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
स तत्र व्रीडितः शुष्को मृतकल्पोऽवतिष्ठति ||
५ ग