कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
सर्वेषां च पुनस्तेषां सर्वय़ोगवहो मय़ः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
सर्वेषां चैव दिव्यानामस्त्राणामप्रसन्नताम् |
२२७ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
कोटिकाश्य उवाच
सर्वेषां चैव पार्थानां प्रिय़ा वहुमता सती |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां चैव भूतानामिदमासीन्मनोगतम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां चैव भूतानामुद्यतेऽस्त्रे महात्मना ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां चैव योधानां सामग्र्यं स्यान्ममाच्युत ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां तत्र भूतानां लोमहर्षो व्यजाय़त |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
कृष्ण उवाच
सर्वेषां तात भूतानां विनाशे समुपस्थिते |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
इन्द्राण्यु उवाच
सर्वेषां तेज आदत्स्व स्वेन वीर्येण दर्शनात् |
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषां तोय़कलशाञ्जगृहुस्ते स्वय़ं तदा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
सर्वेषां त्वं प्राणिनामन्तकाले; कामक्रोधौ सहितौ योजय़ेथाः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषां दीप्तय़शसां कुरूणां धर्मचारिणाम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषां द्रौपदी भार्या भविष्यति हि नः शुभा ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषां द्रौपदी राजन्महिषी नो भविष्यति |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषां धर्मतः कृष्णा महिषी नो भविष्यति |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां धार्तराष्ट्राणां रणे शर्म च वर्म च ||
१०४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
राजान ऊचुः
सर्वेषां नः क्रतुफलं धर्मश्च प्रतिगृह्यताम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भरद्वाज उवाच
सर्वेषां नः प्रभवति कस्माद्वर्णो विभज्यते ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वासुदेव उवाच
सर्वेषां निश्चितं तन्नः प्रेषय़िष्यति यद्भवान् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
सर्वेषां निष्प्रभकरो ज्योतिषामिव भास्करः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
सर्वेषां नो वलार्धेन त्वमेव जहि शात्रवान् ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां पाण्डुपुत्राणां जय़ः पार्थे प्रतिष्ठितः |
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां पार्थिवेन्द्राणामग्रसत्ताञ्शरोत्तमान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
सर्वेषां पुनराधानं विधिदृष्टेन कर्मणा ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां प्राणिनां भीरु निष्ठैषा कालनिर्मिता ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषां प्राणिनां लोके तिर्यक्ष्वपि निवासिनाम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
सर्वेषां भक्ष्यभोज्यानामन्नं परममुच्यते |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषां भूतसङ्घानां हर्षान्नादः समुत्थितः |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषां भूमिपालानां द्रुपदश्च महीपतिः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वेषां मम पुत्राणां स एकः क्रूरविक्रमः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
सर्वेषां राजय़ुक्तानां दुष्कृतं परिपृष्टवान् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषां वलिनां मूर्ध्नि मय़ेदं निहितं पदम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषां वलिनां श्रेष्ठो जातोऽय़मिति भारत ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
सर्वेषां वालवृद्धानां देवापिर्हृदय़ङ्गमः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सर्वेषां वासुदेवानां कृष्णे लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
सर्वेषां विवुधानां च वक्तव्यः स्यामहं शुभे ||
२५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
सर्वेषां वै प्राणिनां प्राणनान्ते; तस्माच्छोकं मा कृथा वुध्य वुद्ध्या ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
सर्वेषां वो द्विजश्रेष्ठ दिव्यं यानमुपस्थितम् |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वेषां समवेतानां पुत्राणां मम सञ्जय़ ||
४९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित्क्वचित् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
सर्वेषामग्रणीर्विष्णुः सेव्यः पूज्यश्च नित्यशः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
सर्वेषामजघन्यस्तु राम आसीज्जघन्यजः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
सर्वेषामथ तेषां तु गण्डाभूत्कर्मकारिका |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषामवरोधानामार्तनादो महानभूत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
सर्वेषामाश्रय़ो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः |
८७ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामाश्रय़ोऽस्माकं रणेऽरीणां प्रमर्दिता |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
सर्वेषामृद्धिकामानामन्ये रथपुरःसराः |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वेषामृषिपुत्राणामेष चासीन्मनोरथः |
३ क