वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वैस्तैरभ्यनुज्ञाता विशोकाः समुपाविशन् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
सर्वैस्त्वं सहितो भीम निवर्तस्वाय़तेक्षण ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
सर्वो योधः परं त्यक्तुमाविष्टस्त्यक्तजीवितः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
सर्वो लुव्धः कर्मगुणोपभोगे; योऽर्थैर्हीनो धर्मकामौ जहाति ||
४५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
सर्वो हि पुरुषो भोज साध्वेतदिति निश्चितः |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
सर्वो हि मन्यते लोक आत्मानं वुद्धिमत्तरम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
सर्वोच्छेदे च यतते वैरस्यान्तविधित्सय़ा ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वोत्साहं क्षत्रिय़ाणां निहत्य; प्रसह्य कृष्णस्तरसा ममर्द ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
सर्वोद्योगेन महता धनञ्जय़मुपाद्रवत् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
सर्वोद्योगेन सहसा पाण्डवाः समुपाद्रवन् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
सर्वोद्योगेनाभिजग्मुर्द्रोणमेव युय़ुत्सय़ा ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
सर्वोद्योगैराश्रमं धर्ममाहुः; क्षात्रं ज्येष्ठं सर्वधर्मोपपन्नम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वोपकरणैर्युक्तं युक्तमश्वैर्मनोजवैः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वोपकरणैर्युक्तमजय़्यं देवदानवैः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वोपकरणैर्युक्ता वैद्याश्च सुविशारदाः ||
७८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
सर्वोपकरणैर्युक्ताः कुशलास्ते सुशिक्षिताः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
सर्वोपकारिणो धीराः सर्वधर्मानुपालकाः ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वोपपन्नः पुरुषो मनोरमः; श्यामो युवा वारणय़ूथपोपमः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
सर्वोपवासी निय़तः स्वाध्याय़परमः शुचिः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
सर्वोपाय़ेन कामस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
सर्वोपाय़ैः सहाय़ास्ते प्रभाते वय़मेव हि |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
सर्वोपाय़ैराददीत धनं यज्ञप्रय़ोजनम् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
सर्वोपाय़ैरुज्जिहीर्षेदात्मानमिति निश्चय़ः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
सर्वोपाय़ैरुपाय़ज्ञो दीनमात्मानमुद्धरेत् ||
९२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वोपाय़ैर्न तच्छक्यं केनचित्कर्तुमन्यथा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
सर्वोपाय़ैर्न स कथं वध्यः पुरुषसत्तम ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सर्वोपाय़ैर्निहन्तव्यः पापो निकृतिजीवनः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
सर्वोपाय़ैर्निहन्तव्याः शत्रवः शत्रुकर्षण |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
सर्वोपाय़ैर्निय़न्तव्यः सानुगः पापपूरुषः |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
सर्वोपाय़ैर्निय़न्तव्या विकर्मस्था नराधिप ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
सर्वोपाय़ैर्निय़म्यः स तथा पापान्निवर्तते ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
वृहस्पतिरु उवाच
सर्वोपाय़ैर्मघवन्संनिय़च्छ; संवर्तं वा पार्थिवं वा मरुत्तम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
सर्वोपाय़ैर्यतिष्यामि पाञ्चालानामहं वधे |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सर्वोपाय़ैर्यतिष्यामि यथा वीभत्सुराहवे |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
सर्वोपाय़ैर्यथाकामं भवांस्तदधिगच्छतु ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वोपाय़ैर्विनाशाय़ न समृद्धं च तत्तव ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
सर्वोपाय़ैर्विमोच्यास्ते निगृह्य परिपन्थिनः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वोपाय़ैर्हरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
सर्वोपाय़ैर्हि नेष्यामि प्रेतराजनिवेशनम् |
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
सर्वोपाय़ैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
सर्वोपाय़ैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
सर्वोऽय़ं व्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीय़ते |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
सर्वौषधिसमावापैः सर्वतः परिवृंहितः |
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
सर्वौषधीः समावाप्य सर्वरत्नानि चैव हि |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
सर्वय़ज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु चाप्लुतम् |
३९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वय़त्नेन तेनापि गृह्णन्नेतदकल्पय़त् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
सर्वय़त्नेन मध्यस्थं न तन्मित्रं विदुर्वुधाः ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वय़ा सेनय़ा सार्धमस्मान्योद्धुमुपागतः ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
सर्वय़ुद्धविभागज्ञमन्तकप्रतिमं युधि ||
७ ख