chevron_left  सवाष्पमभिनिःश्वस्यarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
सवाष्पमभिनिःश्वस्य धिग्धिग्धिगिति चाव्रवीत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सवाह्लीकान्कुरून्व्रूय़ाः प्रातिपेय़ाञ्शरद्वतः ||
५६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
सविक्रोशं सकरुणं वान्धवानां स्त्रिय़ो नृप ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
सविता च ऋचीकोऽर्को भानुराशावहो रविः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महावलः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
सविता यत्र सन्ध्याय़ां साध्यानां वर्तते तपः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
सविद्युत्स्तनिता मेघाः सर्वदिग्भ्य इवोष्णगे ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
सविद्युदभ्रं सवितुः शिष्टं वातहतं यथा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
सविप्रसङ्घाश्च सुरासुराश्च; नागाः पिशाचाः पितरो वय़ांसि |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
सविमाना यथा सिद्धाः स्वर्गात्पुण्यक्षय़े तथा ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
सविशेषं त्वमोघाय़ाः कृष्णोऽरक्षत पाण्डवम् |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
सविशेषमवर्तन्त भीममेकं विना तदा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
सविशेषाणि भूतानि गुणांश्चाभजतो मुनेः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
सविषं काण्डमादाय़ मृगय़ामास वै मृगम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
सविषाणं भुजं मूले खड्गेन निरकृन्तत ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
सविष्फुलिङ्गज्वालाभिः समन्तात्परिवेष्टितम् ||
५७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
सविष्फुलिङ्गां दीप्ताग्रां शक्तिं चिक्षेप भारत ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
सविस्फुलिङ्गं सज्वालं सधूमं ह्यतिदारुणम् ||
२२ ग
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
सविस्फुलिङ्गज्वालानि सधूमानि च सर्वशः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सविस्फुलिङ्गा निर्भिद्य निपपात महीतले ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
सविस्फुलिङ्गो दीप्तार्चिः सोऽदहद्वाहिनीद्वय़म् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सविस्फुलिङ्गो निर्ह्रादस्तय़ोस्तत्राभिघातजः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
सविहारं सुखं जग्मुर्नगरं नागसाह्वय़म् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
सवृक्षौषधिरत्नेय़ं ससरित्पर्वताकरा |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
सवृद्धवालं सस्त्रीकं रथ्यागतमरिन्दमम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
सवृद्धवालाः सहिताः शंसन्ति त्वां युधिष्ठिर ||
७७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
सवृद्धवालेष्वथ वा पार्थिवेषु महात्मसु |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
सवृष्णिभोजान्धकय़ोधमुख्या; समागता क्षत्रिय़शूरसेना |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
सवेदाः सश्रुतीकाश्च कृताः पूर्वं कृते युगे ||
९४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
सवैजय़न्त्यङ्कुशवर्मय़न्तृभि; र्निपातितैर्निष्टनतीव गौश्चिता ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
सव्यं चक्रं युधामन्युरुत्तमौजाश्च दक्षिणम् |
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सव्यं तु मण्डलं तत्र भीमसेनोऽभ्यवर्तत ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सव्यं वास्या च यस्तक्षेत्समावेतावुभौ मम ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
प्रतीप उवाच
सव्यतः कामिनीभागस्त्वय़ा स च विवर्जितः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
सव्यदेशे तु देवस्य व्रह्मा लोकपितामहः |
१४१ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
सव्यसाचिनमादाय़ नैषादिं प्रति जग्मिवान् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
सव्यसाचिनमासाद्य भिन्ना नौरिव सागरे ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
सव्यसाचिनि सङ्क्रुद्धे त्रैगर्तान्भय़माविशत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
सव्यसाचिन्महावाहो पूर्वदेव सनातन |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
सव्यसाचिन्समीक्षस्व लोकपालानवस्थितान् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
सव्यसाचिप्रतिरथस्तं निवर्तय़ पाण्डवम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
सव्यसाचिवधाकाङ्क्षी शक्तिं रक्षितवान्हि सः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
सव्यसाची ततः श्रान्तः पानीय़ं सोऽभ्यधावत ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
सव्यसाची तु तं दृष्ट्वा पलाय़न्तं जय़द्रथम् |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
सव्यसाची तु सङ्क्रुद्धो विकृष्य वलवद्धनुः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
सव्यसाची त्वय़ा चैव युधि शूरः समेष्यति ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
सव्यसाची पुरोऽभ्येति द्रोणानीकाय़ भारत |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
सव्यसाची महेष्वासमश्वत्थामानमव्रवीत् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
सव्यसाचीति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
सव्यस्याक्ष्णो विकारश्चाप्यनिष्टः समपद्यत ||
४५ ख