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शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
सहसा प्रादुरभवत्समीपे देवय़ोस्तदा ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
सहसा प्राद्रवञ्शिष्टा मृद्नन्तस्तव वाहिनीम् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
सहसा प्रापतद्द्रोणं पतङ्ग इव पावकम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
सहसा लोहदण्डाभ्यामन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
सहसा वारिणा सिक्ता न यान्ति परिभावनाम् ||
१७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
सहसा संनिवृत्तोऽभूच्छ्रिय़ं दृष्ट्वा सुय़ोधने ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
सहसा सन्तितीर्षन्तं पार्थं शस्त्रास्त्रसेतुना ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सहसा सिन्धुराजस्य वधो गाण्डीवधन्वना ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
सहसाभ्यद्रवद्राजन्यत्र तस्थौ वृकोदरः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
सहसाभ्यपतत्सैन्यं तावकं पार्थकारणात् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
सहसाभ्यहनं भूतं तान्यप्यस्त्राण्यभक्षय़त् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
सहसाभ्यागतभय़ः सोद्वेगस्तेन कर्मणा ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
सहसाभ्यागतां भैमीमभ्याशपरिवर्तिनीम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
सहसास्त्रविसर्गेण वय़ं तेनाद्य वञ्चिताः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
सहसेनः सहामात्यो द्रौपदेय़ानवारय़त् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
सहसेनौ समार्छेतां पाण्डवं क्लान्तवाहनम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
सहसैकरथः पार्थस्त्वामभ्येति परन्तप |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
सहसैन्यश्च पार्थस्य साहाय़्यार्थमिय़ेष सः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
सहसैन्याः समापेतुः पुत्रस्य तव शासनात् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
सहसैन्यानहं तांश्च प्रतीय़ां रणमूर्धनि ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
सहसैन्यौ सहानीकं यथेन्द्राग्नी पुरा वलिम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
सहसैव महाराज देवान्सर्वान्प्रमोहय़त् ||
२९ ग
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
सहसैव समाजग्मुरादाय़ोल्काः सहस्रशः ||
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
सहसैवाभिसङ्क्रुद्धास्तदासीत्तुमुलं महत् ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
सहसैवाभ्यहन्यन्त ततः शव्दो महानभूत् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शव्दस्तुमुलोऽभवत् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
सहसैवाभ्यहन्यन्त सशव्दाश्च समन्ततः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
सहसैवोत्थितो रङ्गे भिन्दन्निव नभस्तलम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
सहसोत्थाय़ संहृष्टो यानमेवान्वपद्यत ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
सहसोत्पतितं व्याघ्रमाससाद महावलः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
सहसोत्पतितः क्रोधः कर्णं दृष्ट्वा प्रशाम्यति ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साश्रुलोचनाम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
सहसोत्पत्य वेगेन सर्वानादाय़ वीर्यवान् |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
सहसोदीर्यते तात जगत्प्रव्यथते तदा ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
सहस्ताभरणाभ्यां तु भुजाभ्यां विक्षिपन्धनुः |
३० क
विराट पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
सहस्ताभरणैश्चान्यैः प्रच्छन्ना भाति मेदिनी ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
सहस्ताभरणैश्चान्यैरभवच्छादिता मही ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
सहस्तावापधनुषी तय़ोश्चिच्छेद सात्वतः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सहस्रं च सहस्राणां कन्या हेमविभूषिताः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
सहस्रं तस्य सिंहानां तस्मिन्युक्तं रथोत्तमे |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सहस्रं तु सहस्राणां यस्यासञ्शाशविन्दवः |
९९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा व्राह्मणान्स्म प्रपद्यते ||
११७ ग
वन पर्व
अध्याय ९७
अगस्त्य उवाच
सहस्रं तेऽस्तु पुत्राणां शतं वा दशसंमितम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
सहस्रं त्वेव वर्षाणां निपात्य नरके वसेत् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
सहस्रं दन्तानां शतय़ोजनानां; सुतीक्ष्णानां घोररूपं वभूव ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
नहुष उवाच
सहस्रं दीय़तां मूल्यं निषादेभ्यः पुरोहित |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०१
नारद उवाच
सहस्रं धारय़न्मूर्ध्नां ज्वालाजिह्वो महावलः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
च्यवन उवाच
सहस्रं नाहमर्हामि किं वा त्वं मन्यसे नृप |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
सहस्रं निष्ककण्ठानामददं दक्षिणामहम् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
सहस्रं न्यवधीत्तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
२४ क