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कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
सा जघान वहूनश्वानश्वारोहांश्च मारिष ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
सा जघान हय़ांस्तस्य सारथिं च महारणे |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
सा जनं वारय़ित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २५४
वैशम्पाय़न उवाच
सा जानती ख्यापय़ नः सुकेशि; परं परं पाण्डवानां रथस्थम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
सा ज्येष्ठा सा च पूज्या स्यात्सा च ताभ्यो गरीय़सी ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
सा ज्वलन्ती महोल्केव तमासाद्य महारथम् |
६५ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तं ज्ञात्वा यथावत्तु वह्निं वनमुपागतम् |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
सा तं दृष्ट्वैव राजानं दुःषन्तमसितेक्षणा |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
सा तं दृष्ट्वोग्रतपसं वसिष्ठं तपतां वरम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तं परुषमारव्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
सा तच्छ्रुत्वानवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा |
१ क
वन पर्व
अध्याय १११
लोमश उवाच
सा तत्र गत्वा कुशला तपोनित्यस्य संनिधौ |
६ क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
सा तत्र जज्ञे सुभगा विद्युत्सौदामिनी यथा |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
सा तत्र नीता करुणान्यवोच; न्नान्यं क्षत्तुर्नाथमदृष्ट कञ्चित् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
सा तत्र परमं देवी तपोऽचरत दुश्चरम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
सा तत्र पुत्रानुत्पादय़ामास धर्माद्युधिष्ठिरं मारुताद्भीमसेनं शक्रादर्जुनमिति ||
६९ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
सा तत्र योषा रुदती जलार्थिनी; गङ्गां देवीं व्यवगाह्यावतिष्ठत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तत्र सहसा गत्वा शैलपृष्ठं सुदुर्गमम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
सा तत्सर्वं यथावृत्तं दमय़न्त्यै न्यवेदय़त् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
सा तथा दूय़मानेन हृदय़ेन तपस्विनी |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
सा तथा पाण्डवी सेना वध्यमाना महात्मभिः |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
सा तथा याच्यमाना त्वं काले काले जय़ैषिणा |
९ क
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
सा तथेति प्रतिज्ञाय़ नमस्कृत्य पितामहम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
वृषादर्भिरु उवाच
सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
सा तथोक्ता तथेत्युक्त्वा तेन भर्त्रा वराङ्गना |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २१
भीष्म उवाच
सा तदा तेन विप्रेण तथा धृत्या निवर्तिता |
११ क
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तदा विपुला शक्तिः क्षिप्ता तेन महात्मना |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
सा तदासीद्भृशं सेना व्याकुलाश्वरथद्विपा |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सा तदाहत्य दीप्ताग्रा रथशक्तिरशीर्यत |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २६०
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तद्वचनमाज्ञाय़ तथा चक्रे मनोजवा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तद्वचनमाज्ञाय़ परिगृह्य नराधिपम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तद्वचनमाज्ञाय़ सर्वाभरणभूषिता |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
सा तमग्निसमं विप्रमनुचिन्त्य सरिद्वरा |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
सा तमादाय़ सुश्रोणी ससार भृगुनन्दनम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तमालक्ष्य सम्प्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
सा तमालोक्य सहसा प्रत्युत्थातुमिय़ेष ह |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
सा तमासाद्य राजानं शाल्वं वचनमव्रवीत् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
सा तमुवाच |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
सा तवेन्द्रं दर्शय़िष्यतीति ||
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
भीष्म उवाच
सा तस्मै विधिवत्पूजां चक्रे धर्मपराय़णा |
५ क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
सा तस्मै सर्वमाचष्ट यवक्रीभाषितं शुभा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
सा तस्य चित्तं हरति शारदाभ्रमिवानिलः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
सा तस्य छिद्रमन्वैच्छच्चिरात्प्रभृति भामिनी |
५० ख
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सा तस्य जाम्वूनदपुष्पचित्रा; मालेव चित्राभिविराजते स्म ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
भीष्म उवाच
सा तस्य दृष्ट्वैव मनो जहार शुभलोचना |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
सा तस्य द्विजमुख्यस्य निपपात भुजान्तरे |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
सा तस्य मर्माणि विदार्य शुभ्र; मुरो विशालं च तथैव वर्म |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सा तस्य रथमासाद्य निर्मुक्तभुजगोपमा |
७६ क
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
सा तस्य शीलमाज्ञाय़ तस्माच्छापाच्च विभ्यती |
४ क